दशहरा SPECIAL : दिल्ली से सटे इस गांव में हुआ था रावण का जन्म, यहां नहीं मनाया जाता दशहरा, न ही रामलीला मंचन और न ही रावण दहन
बिसरख गांव स्थित प्राचीन मंदिर जहां रावण ने भगवान शिव की तपस्या की थी।
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| मंदिर में खुदाई के दौरान निकला विशाल शिवलिंग। मान्यता है कि यह वही शिवलिंग है जिसकी पूजा रावण किया करता था। |
पूरा देश आज जहां रावण के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मना रहा है, वहीं दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के इस गांव की तस्वीर थोड़ी जुदा है। इस गांव में न ही तो आज तक कभी दशहरा मनाया गया और ना ही यहां रावण का पुतला जलाया जाता है। और सबसे बडी़ बात इस गांव में आज तक रामलीला मंचन भी नहीं हुआ। दशहरे के दिन इस गांव में मातम होता है। यहां गायों के रंभाने और चिड़ियों की चहचहाने के बीच पौराणिक असुर राज के जीवन और शिक्षाओं का जश्न मनाया जाता है। यहां आज भी रावण बाबा हैं। आइए आज हम आपको बताते हैं, क्या है इन सबके पीछे का कारण।
8 अक्तूबर 2019, 4:41 PM
हरियाणा मीडिया जंक्शन। संदीप कम्बोज/गौरव सोनी कोटली
नई दिल्ली। आज पूरा देश दशहरा मना रहा है, बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मना रहा है। हर गांव, हर नगर, हर शहर में रावण के पुतले जलाए जाएंगे, लेकिन एक गांव ऐसा भी है जो मातम में डूबा है। यहां कोई जश्न नहीं मनाया जा रहा है. आखिर इस बात की वजह क्या है? दरअसल यहां के लोगों का मानना है कि रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था। गांव का नाम है बिसरख और ये गांव उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में है। इस गांव में किसी से रावण के मंदिर के बारे में पूछेंगे तो आपको शायद ही रूखा जवाब मिले। महंत राम दास ने बताया कि हम रावण के पुतलों का दहन नहीं करते, वह हमारे गांव का बेटा था। वह यहां पैदा हुआ था और हमें इस पर गर्व है। गांव की सीमा से सटा ही रावण मंदिर है जिसमें शिवलिंग है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना ऋषि विश्रवा ने की थी। हालांकि, ग्रामीणों की मानें तो इस गांव में असुर राज रावण की अराधना नहीं की जाती है। पिछले कुछ दिनों में इस गांव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। अब यह गांव रावण के गांव के नाम से पहचान बना चुका है। हालांकि ऐसा बीते एक दशक में ही हुआ है। इससे पहले तक यहां पहुंचना काफी कठिन था। गांव के आस पास आबादी कम थी और जंगल अधिक था लेकिन अब चारों तरफ आबादी है। नोएडा का विकास होने के बाद से लोग यहां पहुंचने लगे हैं। अब रामायण सर्किट में इस गांव को भी शामिल कर लिया गया है़।
जानें इसके पीछे क्या है मान्यता ?
माना जाता है कि रावण के पिता महर्षि विश्रवा का आश्रम यहीं था। ये इलाका घने जंगल का था लिहाजा उन्होंने तपस्या के लिए इसी इलाके को चुना था। गांव में एक शिव मंदिर भी है। मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना खुद महर्षि विश्रवा ने की थी। यहां गांव के लोग रावण को रावण बाबा कह कर संबोधित करते हैं। कुछ वक्त पहले गांव के कुछ लोगों ने यहां रावण प्रतिमा स्थापित करनी चाही थी लेकिन विवाद हो गया था। इस गांव में ना तो दशहरा मनाया जाता है और ना ही रावण का पुतला जलाया जाता है।
गांव में इसलिए नहीं होती रामलीला
बिसरख में रामलीला भी नहीं होती। बताते हैं कि एक-दो बार ऐसी कोशिश की गई थी लेकिन गांव में किसी का किसी की मौत हो गई। कुछ पुराने लोगों का दावा है कि 90 के दशक में यहां खुदाई भी कराई गई थी जिसमें एक प्राचीन शिव प्रतिमा व अन्य कुछ सामान निकला था।




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