हरियाणा विधानसभा चुनाव पर हरियाणा मीडिया जंक्शन की विशेष प्रस्तुति
अथ श्री चुनाव कथा भाग-1
मैं समय हूँ। सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक जितने भी युग आए, मैंने हर युग की राजनीति को बड़ी ही बारिकी से इतिहास से गुजरते देखा है। और मुझसे ज्यादा बारिकी सेभला देख भी कौन सकता है, क्योंकि मेरा कोई अंत नहीं, मैं अनंत हूं। मैं तब भी था,आज भी हूं और हमेशा रहूंगा। मैं देखता आया हूं कि राजनीति ने जब-जब राष्टÑ की फिक्र छोड़कर पुत्र मोह, सगे-संबंधियों के मोह व स्वार्थ सिद्धी का प्रयास किया है, तब-तब उस राष्टÑ का सर्वनाश हुआ है। सिर्फ मतलब के लिए की जाने वाली राजनीति ने आज तक न जाने कितने ही कुलों का विनाश कर डाला। मैंने देखा कि स्वच्छ राजनीति को जीवित रखने के लिए किस तरह से पाप, जुल्म, अधर्म व अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़नी पड़ी, किस तरह से स्वच्छ राजनीति को दबाने के लिए अधर्म, अन्याय और जुल्मो-सितम की इंतहा कर दी गई, हजारों-लाखों निर्दोष इंसानों का लहू बहा लेकिन हर लड़ाई के अंत में विजय सत्य की ही हुई। सदियों पहले धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में भी मैंने भाई को भाई का लहू बहाते देखा है। कुरुक्षेत्र का वह धर्मयुद्ध भी खुदगर्ज राजनीति का ही तो परिणाम था। सत्ता की लालसा में हुए इस धर्मयुद्ध में लाखों लोग मारे गए। समूचे भारतवर्ष में एक भी घर ऐसा नहीं बचा था जहां किसी न किसी अपने की मौत का मातम न मना हो। इसलिए हे वर्तमान भारतवर्ष के मानव तू ऐसी राजनीति कदापि मत करना। राष्ट को ही अपना परिवार समझना। एक बात हमेशा याद रखना जिस दिन भी तूमने राष्टÑ को एकतरफ कर खुद को अपने पुत्र, परिवार, प्रियजनों व चेले-चपाटों तक सीमित कर लिया, उस दिन से ही तेरा तो विनाश शुरु होगा ही साथ ही, राष्टÑ व प्रजा को जो हानि उठानी होगी, सो अलग। थोड़ा पीछे लिए चलता हूं। हरियाणा के पूर्व बादशाह मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला की करतूतों को भला कौन नहीं जानता है? अपने चहेतों को नौकरियां देने के लिए किस तरह से उन्होंने जेबीटी भर्ती की एक दिन पूर्व जारी की गई लिस्ट को रातों-रात बदलवा डाला था। राज-पाठ गया, परिवार टूटा, राजनीतिक दल इनेलो भी हाशिये पर पहुंचा और बुढ़ापे में भी जेल की सलाखों में अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं, सो अलग।
इसलिए हे मानव ! आज से मैं जो यह चुनाव कथा सुनाने जा रहा हूं, इसे ध्यान से सुन और उसका अनुसरण कर। हे राजनेता ! हमेशा स्वच्छ राजनीति कर, किसी से भेदभाव न कर क्योंकि तेरे लिए सारी प्रजा ही तेरा परिवार है। अपने पद व कुर्सी का फायदा उठाकर न ही तो कोई गलत काम कर और न ही किसी को सता। तुम्हारे किए गलत कामों की सजा देने भले ही आज भगवान श्री कष्ण नहीं आएंगे, इंसानों की बनाई अदालत में भी तू बेईमानी, भ्रष्टाचार से कमाए धन के बलबूते खुद को बचा लेगा लेकिन याद रख एकदिन ऊपरवाले की अदालत में इंसाफ जरूर होगा। तो हे राजनेता अब ध्यान से कथा सुन।
वैसे तो मेरे लिए समस्त वसुंधरा एक समान है और मैं हर पल पूरी सृष्टि पर नजरें गड़ाए रहता हूं। लेकिन हरियाणा की धरा से मुझे तबसे ही बेइंतहा प्यार हो गया, जब सदियों पहले धर्मयुद्ध कुरुक्षेत्र के दौरान मैं यहां 18 दिन तक लगातार कुरुक्षेत्र ठहरा था। बस तबसे ही मेरी नजरें हरियाणा की जमीं से हटने का नाम ही नहीं लेती। मुझे याद है जब वर्ष 1966 में भाषाई आधार पर राज्यों के बंटवारे की मांग ने जोर पकड़ा तो हिन्दुस्तान के हुक्मरानों ने 1 नवंबर को दो अलग-अलग राज्यों का गठन कर पंजाबी भाषी क्षेत्र का नाम पंजाब तो हरियाणवी भाषी क्षेत्र का नाम हरियाणा रख दिया। हरियाणा की राजनीति के अध्याय की हर घटना भी मेरे सामने घटी है, इसलिए मैं जानता हूं कि यहां की राजनीति का असल सत्य क्या है और असत्य क्या? सही क्या और गलत क्या? इसलिए बगैर कोई प्रतिक्रिया दिए चुपचाप सब देख रहा हूं क्योंकि प्रतिक्रिया देना न तो मेरा कर्म है और न ही स्वभाव। हरियाणा के चुनावी इतिहास के जिस पन्ने का आज मैं जिक्र करने जा रहा हूं वो 1966-67 के पहले हरियाणा विधानसभा चुनाव का है। उस वक्त हरियाणा में 81 विधानसभा सीटें थी। 48 सीटें जीतकर कांग्रेस ने सत्ता हासिल की थी। यमुनानगर से विधायक चुने गए कांग्रेस के भगवत दयाल शर्मा ने हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री का ताज पहना था। इस चुनाव में कांग्रेस ने प्रदेशभर में 1252290 वोट हासिल किए थे जो कि कुल वोट का 41.33 फीसद था। जबकि 48 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले भारतीय जनसंघ ने 436145 वोट हासिल कर12 सीटों पर विजय पाई थी। इस चुनाव में भारतीय जनसंघ का वोट फीसद 14.39 रहा था। इसके अलावा 260 निर्दलिय उम्मीदवारों में से 16 ने विजय श्री का ताज पहना था। इस चुनाव में निर्दलिय उम्मीदवारों ने 998969 वोट हासिल किए थे जो कुल वोट का 32.97 फीसद था। भगवत दयाल शर्मा के मुख्यमंत्री पद के रूप में शपथ लेने के बाद हरियाणा की पहली विधानसभा के कामकाज की शुरुआत हो चुकी थी। पहले विस चुनाव में करारी हार से भारतीय जनसंघ को तगड़ा झटका लगा था। भारतीय जनसंघ को तो निर्दलिय उम्मीदवारों से भी बहुत कम वोट मिले थे। अब वे अपनी हार के मंथन में जुट चुके थे कि आखिर कमी रही तो कहां? और खुशी से गदगद कांग्रेस सरकार भी सत्ता की बागडोर को कसकर पकड़े हुए थी। तो अब तक आप पढ़ चुके हैं हरियाणा के पहले विधानसभा चुनाव तक की कथा। अब कथा को यहीं विराम देता हूं। इससे आगे की कथा के लिए कल तक इंतजार कीजिएगा।
प्रस्तुति : संदीप कम्बोज
मुख्य संपादक, हरियाणा मीडिया जंक्शन


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