राह क्लब के उपाध्यक्ष सूर्यकांत ने 53 पौधे लगा मनाया जन्मदिन
आईटीआई, धान्सू व पीरावाली गांव में राह ग्रुप के सदस्यों ने किया पौधारोपण
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राह क्लब हिसार के उपाध्यक्ष सूर्यकांत शर्मा के जन्म दिन पर पौधारोपण करते संस्था के सदस्यगण |
हरियाणा मीडिया जंक्शन न्यूज
हिसार। प्रत्येक सदस्य के जन्मदिन पर पौधारोपण करने की राह ग्रुप फाउंडेशन की परम्परा के अनुरुप राह क्लब हिसार के उपाध्यक्ष सूर्यकांत शर्मा के जन्म दिन पर संस्था की तरफ से तोशाम रोड स्थिय आईटीआई, गांव धान्सू स्थित लक्ष्य पब्लिक स्कूल व पीरावाली गांव में पौधारोपण किया गया। इस दौरान जहां आईटीआई में साधारण रुप से व लक्ष्य पब्लिक स्कूल में मटका थरैपी से पौधारोपण किया गया। यह जानकारी देते हुए राह क्लब हिसार के अध्यक्ष रामअवतार वर्मा ने प्लांटेशन विद् मटका थरेपी के अर्न्तगत अमरुद, पत्ता कढ़ी, अलताश व जामून सहित विभिन्न छायादार, फुलदार व फलदार पेड़ों के पौधे लगाए गए। इस दौरान राह ग्रुप के राष्ट्रीय चेयरमैन नरेश सेलपाड़, वाईस चेयरमैन रामनिवास वर्मा, हरियाणा प्रभारी कमल हांडा, राह क्लब हिसार के सचिव विजेन्द्र सैनी, अमित लांबोरिया, सोनू सैनी, आईटीआई हिसार से मोहन सुथार, मंजित सिंह, सोहन लाल, विपुल सैनी सहित स्टाफ व विद्यार्थियों ने पौधारोपण किया। राह क्लब हिसार के अध्यक्ष रामअवतार वर्मा के अनुसार मटका पद्धति से पौधों में खाद व पानी की जड़ों तक सीधा पहुंचता है। जिससे अनुमानित तौर पर 90 फीसदी से अधिक पानी की बचत होती है। इसके अलावा इस पद्वति से पौधों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। सूखे क्षेत्रों के लिए यह पद्धति बहुत ही कारगर साबित हो सकती है। जिसके कारण अब मटका पद्धति से पौधरोपण किया जा रहा है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इसका इस्तेमाल करने से पौधे के बड़े होने तक लगातार इसका उपयोग किया जा सकता है और बहुत ही कम संसाधन और सरल तकनीक होने से पौधे का विकास भी पहले से तीन गुणा तेजी से होता है।
राजस्थान व पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान
राह ग्रुप फाउंडेशन के राष्ट्रीय चेयरमैन नरेश सेलपाड़ के अनुसार पानी की कमी तथा पहाड़ी और ढलान के भौगोलिक क्षेत्र के लिए यह तकनीक बेहद कारगर साबित है। इसके अलावा अम्लीय, लवणीय या अन्य प्रकार की अशुद्धियों वाले पानी की स्थिति में भी इस तकनीक से कम पानी में अधिक संख्या में पौधों की सिंचाई की जा सकती है। उनके अनुसार करनाल के केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसन्धान संस्थान ने तो बाकायदा घड़ा सिंचाई तकनीक से पौधारोपण की सिफारिश की है।
सात दिन तक नहीं पड़ेगा पानी
मटका तकनीक से यह फायदा होता है कि आप एक बार मटके को पानी से भर देंगे तो अगले सात दिनों तक आपको फिर पौधे को पानी देने की जरूरत नहीं होगी। मटके की तली में लगी जूट या सूत की रस्सी बूंद-बूंद कर टपकते हुए पौधे की जड़ों तक पानी पहुंचाती रहेगी। जैसे-जैसे पौधा पानी लेता रहेगा। वैसे-वैसे मटके में पानी कम होता जाएगा। इस तरह तो पानी समय और मेहनत की बचत होती है। साथ ही पौधा भी तेज गति से बढ़ता है, क्योंकि उसमें जरूरत के अनुसार नमी बनी रहती है। जबकि साधारण पद्वति में पौधों को ऊपर से पानी डालने के बाद तेज धूप के कारण अधिकांश पानी उसी दिन सूख जाता है। यह पद्धति काफी कारगर साबित होती है।
खेती में भी कारगर
बहुत ही कम संसाधन और सरल सी इस तकनीक के अपनाने से ही पौधे का विकास भी तेजी से होता है। इसके जरिए फलों और सब्जियों की खेती भी की जा सकती है। इसमें सबसे कम मात्रा में पानी की खपत होती है यानी पानी की ज्यादा-से-ज्यादा बचत की जा सकती है। अब देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी इस पद्धति से पौधों को पानी दिया जा रहा है।,


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