चांद पर जिंदगी की तलाश, जानें हिन्दुस्तान के मिशन चंद्रयान-2 की पूरी कहानी
संदीप कम्बोज। मीडिया जंक्शन
नई दिल्ली। लो जी, एक बार फिर शुरु हो गई है धरती से 3 लाख 84 हजार किमी़ दूर चांद पर जिंदगी की तलाश। और यह इतिहास रचा है हिन्दुस्तान ने। आज दोपहर 2 बजकर 43 मिनट पर भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने चंद्रयान-2 को सफलता पूर्वक लॉन्च कर दिया। इससे पहले चंद्रयान-2 को 15 जुलाई को लॉन्च किया जाना था, लेकिन आखिरी वक्त पर तकनीकी खराबी होने से चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग को टाल दिया गया था। चंद्रयान-2 को चांद पर पहुंचने में 48 दिन लगेंगे यानि 6 सितंबर को चंद्रयान-2 चांद की सतह पर उतरेगा। इस मिशन की सफलता के बाद भारत उन कुल 4 देशों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग की है। सॉफ्ट लैंडिंग करना इतना खतरनाक है कि अभी तक अमेरिका, रूस, चीन ही इस कारनामे को अंजाम दे पाए हैं। चंद्रयान-2 चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। इससे पहले किसी भी देश ने चांद के दक्षिणी ध्रुव में लैंडिंग नहीं है। इसी के साथ भारत यहां उतरने वाला विश्व का पहला देश बन जाएगा। दक्षिणी ध्रुव पर काफी अंधेरा होता है। वहां सूर्य की किरणे भी नहीं पहुंच पाती है। इसलिए किसी भी देश ने आज तक वहां लैंडिंग करने की हिम्मत नहीं की। चांद के इस क्षेत्र का तापमान भी बहुत कम है इसलिए वहां बर्फ या पानी मिलने की उम्मीद वैज्ञानिकों को होगी। इससे पहले चंद्रयान-1 भी चांद पर पानी की खोज की थी। जिसने विश्व को हैरत में डाल दिया था।
978 करोड़ की लागत से बना है चंद्रयान-2
चंद्रयान-2 को बनाने में 978 करोड़ की लागत लगी है। ये पूरे तरीके से स्वदेशी तकनीक से निर्मित हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य चांद पर पानी की मात्रा का अध्ययन करना, चांद पर मौजूद खनिजों, रयासनों के बारे में पता करना, चांद के वातावरण का अध्ययन करना शामिल है। चंद्रयान-2 में कई प्रकार के कैमरे, रडार लगे हैं जिससे चांद के बारे में गहराई से अध्ययन हो सकेंगा। चंद्रयान-2 को बाहुबली रॉकेट से चांद पर भेजा गया है। इस रॉकेट का नाम GSLV Mk 3 है। इसे बाहुबली रॉकेट के नाम से जाना जाता है। ये सबसे ताकतवर रॉकेट में से एक है। इसकी लंबाई 44 मीटर है और इसका वजन 640 टन है।
ऑक्सीजन, पानी व बर्फ का पता लगाएगा चंद्रयान-2
वैज्ञानिक उद्देश्यों की बात करें,तो चंद्र स्थलाकृति, खनिज विज्ञान, तात्विक बहुतायत, चंद्र एक्सोस्फीयर की स्टडी के लिए प्रयोग किये जाएंगे। इसी के साथ हाइड्रॉक्सिल (एक ऐसा मॉलिक्यूल, जिसमे हयड्रोफेन और ऑक्सीजन होती है) के साइन देखे जाएंगे। इसी के साथ लनर सरफेस पर पानी बर्फ समेत ऐसे चीजों को खोजा जाएगा, जिससे यह पता लगे की वहां पर जिंदगी संभव है या नहीं?
क्या होता है सॉफ्ट-लैंडिंग का मतलब? चंद्रयान 2 की अवधि क्या है?
सॉफ्ट लैंडिंग तकनीकी टर्म है। इसका मतलब लैंडिंग की टेक्निक से है। आसान भाषा में समझाए, तो सॉफ्ट लैंडिंग का मतलब, एक ऐसे टेक्निक जिससे इंस्ट्रूमेंट्स को बिना किसी क्षति के लैंड कराया जा सके। हार्ड लैंडिंग वो होती हैं, जिसमें लैंडिंग होने पर क्राफ्ट या इंस्ट्रूमेंट्स को क्षति पहुंचती है। लूनर सरफेस पर 14 अर्थ डेज यानी की 1 लूनर दिन में लैंडर और रोवर द्वारा वैज्ञानिक प्रयोग किये जाएंगे। ऑर्बिटर 1 साल तक के लिए परिचालित किया जाएगा।
सॉफ्ट लैंडिंग तकनीकी टर्म है। इसका मतलब लैंडिंग की टेक्निक से है। आसान भाषा में समझाए, तो सॉफ्ट लैंडिंग का मतलब, एक ऐसे टेक्निक जिससे इंस्ट्रूमेंट्स को बिना किसी क्षति के लैंड कराया जा सके। हार्ड लैंडिंग वो होती हैं, जिसमें लैंडिंग होने पर क्राफ्ट या इंस्ट्रूमेंट्स को क्षति पहुंचती है। लूनर सरफेस पर 14 अर्थ डेज यानी की 1 लूनर दिन में लैंडर और रोवर द्वारा वैज्ञानिक प्रयोग किये जाएंगे। ऑर्बिटर 1 साल तक के लिए परिचालित किया जाएगा।


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