जानें हिन्दुस्तान में टेलीविजन इतिहास की कहानी
भुलाए नहीं भूलता दूरदर्शन का वो जमाना
भले ही आज की नई पीढ़ी को इस बात पर यकीन न हो, पर सच तो यही है कि दूरदर्शन के शुरूआती कार्यक्रमों की लोकप्रियता का मुकाबला आज के किसी चैनल के कार्यक्रम शायद ही कर पाएं। चाहे 'रामायण' हो या 'महाभारत', 'चित्रहार' हो या कोई फिल्म, ‘हम लोग’ हो या ‘बुनियाद’ या फिर ‘अलीफ लैला’ इनके प्रसारण के वक्त जिस तरह लोग टीवी से चिपके रहते थे, वह सचमुच अनोखा था। भारत में टेलीविजन के इतिहास की कहानी दूरदर्शन के इतिहास से ही शुरू होती है। संचार-क्रांती के मौजूदा दौर में भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक 92 प्रतिशत भारतीय घरों तक पहुंचने वाला आकाशवाणी के अलावा यह अकेला माध्यम है। आज भी हर एक भारतीय को इस पर गर्व है कि उसके पास दूरदर्शन के रूप में टेलीविजन का गौरवशाली इतिहास मौजूद है। आज भी दूरदर्शन का नाम सुनते ही अतीत के कई खट्टे-मीठे अनुभव याद आ जाते हैं। आईए आज आपको बताते हैं दूरदर्शन के इतिहास की पूरी कहानी।
नई दिल्ली। भले ही आज टेलीविजन पर सैकड़ों चैनल प्रसारित हो रहे हों और उनमें दिखाए जाने वाले सीरियल व फिल्मों आदि की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त हो लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब केवल और केवल दूरदर्शन का राज चलता था। कौन याद नहीं करना चाहेगा उन सुनहरे दिनों को जब मोहल्ले के इक्के-दुक्के रइसों के घर में टीवी हुआ करता था और सारा मोहल्ला टीवी में आ रहे कार्यक्रमों को आश्चर्यचकित सा देखता था। अगर सिर्फ मनोरंजन की बात करें तो पारिवारिक कार्यक्रम ‘हमलोग’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये थे। इसके बाद आया भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कहानी पर बना 'बुनियाद' जिसने विभाजन की त्रासदी को उस दौर की पीढ़ी से परीचित कराया। इस धारावाहिक के सभी किरदार आलोक नाथ(मास्टर जी), अनीता कंवर(लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ, घर-घर में लोकप्रिय हो चुकी थे। फिर तो एक के बाद एक बेहतरीन और शानदार धारावाहिकों ने दूरदर्शन को घर-घर में पहचान दे दी। दूरदर्शन पर 1980 के दशक में प्रसारित होने वाले मालगड़ी डेज, ये जो है जिंदगी, रजनी, नुक्कड़, ही मैन, सिग्मा,स्पीड, जंगल बुक, वाह जनाब, कच्ची धूप, तमस, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, सुरभि, शांति चित्रहार, कथासागर, विक्रम बेताल आदि ने जो मिसाल कायम की है उसकी तुलना आज के शायद ही किसी धारावाहिक से न की जा सकती।
सात दशक पूर्व वर्ष 1959 में हुई शुरुआत
15 सितंबर 1959 को दिल्ली में दूरदर्शन का पहला प्रसारण प्रयोगात्मक आधार पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया था। किसी भी मीडिया के लिए पचास साल से ज्यादा का सफर बहुत मायने रखता है वक्त के साथ चलने में दूरदर्शन ने कई उतार-चढ़ाव तय किए हैं। बावजूद इसके यह सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के उद्देश्यों से डिगा नहीं है। अब तक दूरदर्शन ने जो विकास यात्रा तय की है वह काफी प्रेरणादायक है। वर्ष 1959 से लेकर 2013 तक के लगभग अपने सात दशक में दूरदर्शन हर वो मुकाम हासिल किया है जिसका उसने लक्ष्य बना रखा था। हालांकि दूरदर्शन की विकास यात्रा प्रारंभ में काफी धीमी रही लेकिन 1982 में रंगीन टेलीविजन आने के बाद लोगों का रूझान इस और ज्यादा बढ़ा और एशियाइ खेलों के प्रसारण ने तो क्रांति ही ला दी। वर्ष 2003 में तो दूरदर्शन ने पृथक रूप से विभिन्न भाषाओं में 24 घंटे का समाचार चैनल भी शुरू कर दिया।
संडे मतलब टोटल 'फन डे'
पुराने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के सामने बैठे किसान भाई 'कृषि दर्शन' और मूक बधिरों के समाचार बड़े चाव से देखते थे। बीच -बीच में आने वाले छोटे विजुअल्स जैसे 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' 'प्यार की गंगा बहे देश में एका रहे' 'स्कूल चलें हम' 'सूरज एक चंदा तारे अनेक' 'एक चिड़िया अनेक चिड़िया' 'एक अन्न का ये दाना सुख देगा मुझको मनमाना' आदि भी बहुत ही चाव से देखे जाते थे। रविवार का दिन तो मानो दूरदर्शन का ही होता था। लोग सुबह उठकर 'रंगोली' देखते, फिर नाश्ता लेकर टीवी से चिपक जाते। दोपहर में ही कुछ समय के लिए टीवी से अलग हटते थे फिर शाम को हर रविवार को दिखाई जाने वाली फिल्म देखने बैठ जाते थे। उस समय के संडे का मतलब होता था आजकल का टोटल 'फन डे'।
इन धारावाहिकों ने दिलाई घर-घर में पहचान
चंद्रकांता
चंद्रकांता 90 के दौर की सबसे फेमस टेलीविजन श्रृंखला थी, यह देवकी नंदन खत्री के उपन्यास पर आधारित थी। चंद्रकांता गुलेरी द्वारा निर्मित और सुनील अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित था। इसके 130 एपिसोड का प्रासारण 1994 से 1996 तक हुआ था। हमें पूरी उम्मीद है कि आपको इसका थीम सॉन्ग जरूर याद होगा। बाद में इसे सोनी टीवी पर भी प्रसारित किया गया।
रामायण
यह ऐतिहासिक पौराणिक धारावाहिक है जिसका निर्देशन रामानंद सागर ने किया था जो 25 जनवरी 1987 को टेलीवीजन पर मूलरूप से टेलीकास्ट हुआ। यह पौराणिक-धार्मिक धारावाहिकों में मील का पत्थर सिद्ध हुआ है। जिसे लोग यू-ट्यूब में अब भी देखना पसंद करते हैं।
अलिफ लैला
अलिफ लैला ने अपने नएपन से सभी को मोहित किया था। सागर फिल्म्स द्वारा निर्मित अलिफ लैला की यादों को भूल पाना मुश्किल है। 260 एपिसोड वाले इस धारावाहिक का थीम म्यूजिक फेसम सिंगर स्वर्गीय रविंद्र जैन ने दिया था।
शक्तिमान
हमें आज भी ऐसा लगता है कि शक्तिमान से बड़ा कोई सुपर हीरो हो ही नहीं सकता। इसे देख लेते थे तो सारा दिन दोस्तों से शक्तिमान की स्टाइल में फाइट करते थे। शक्तिमान मुकेश खन्ना द्वारा निर्मित और दिनकर जानी द्वारा निर्देशित था। दूरदर्शन पर श्रृंखला के लगभग 400 एपिसोड प्रसारित किए गए हैं।
तहकीकात
तहकीकात 90 के दशक में सर्वश्रेष्ठ जासूसी-थ्रिलर श्रृंखला बन गई थी, हलांकि इससे प्रेरित होकर कुछ लोग असल जिंदगी में भी जासूस बन बैठे। शेखर कपूर और करण राजदान द्वारा निर्देशित तहकीकात के 13 एपिसोड बनाए गए थे जिसे दूरदर्शन पर 1994 से 1995 के बीच प्रसारित किया गया था।
ब्योमकेश बक्शी
ब्योमकेश बक्शी के जीवन पर आधारित ब्योमकेश बक्शी पहली हिन्दी टेलीविजन श्रंखला थी। इस सिरीज ने जनता से काफी सराहनाएं बटोरी थी। 34 एपिसोड की इस सिरीज का निर्देशन बसु चटर्जी ने किया था। इसकी ओरिजनल रिलीज 1993 से 1997 है।
हमलोग
टेलीविजन के इतिहास में बहुचर्चित धारावाहिक हमलोग। इसमें मध्यम वर्ग की परेशानी को नाटकीय ढंग से दिखाया गया था। यह 7 जुलाई 1984 को टेलीकास्ट हुआ। जिसे लोकप्रिय लेखक मनोहर श्याम जोशी ने रचनाबद्ध किया था, यह 154 एपिसोड के साथ वर्ष 1985 में समाप्त हो गया था।
करमचंद
जासूसी धारावाहिक की बात करें तो इस समय सिर्फ क्राइम पेट्रोल और ऐतिहासिक सीआईडी ही याद आते हैं लेकिन जासूसी धारावाहिकों की फेहरिस्त में सबसे पहले करमचंद ने भारतीय टेलीविजन में कदम रखा। जो अपने सहायक के साथ अपराध के रहस्यों से पर्दा उठाता था। यह 1985 में प्रसारित हुआ। इसके निर्देशक पंकज पाराशर हैं।
-बॉक्स आफिस डेस्क
भुलाए नहीं भूलता दूरदर्शन का वो जमाना
भले ही आज की नई पीढ़ी को इस बात पर यकीन न हो, पर सच तो यही है कि दूरदर्शन के शुरूआती कार्यक्रमों की लोकप्रियता का मुकाबला आज के किसी चैनल के कार्यक्रम शायद ही कर पाएं। चाहे 'रामायण' हो या 'महाभारत', 'चित्रहार' हो या कोई फिल्म, ‘हम लोग’ हो या ‘बुनियाद’ या फिर ‘अलीफ लैला’ इनके प्रसारण के वक्त जिस तरह लोग टीवी से चिपके रहते थे, वह सचमुच अनोखा था। भारत में टेलीविजन के इतिहास की कहानी दूरदर्शन के इतिहास से ही शुरू होती है। संचार-क्रांती के मौजूदा दौर में भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक 92 प्रतिशत भारतीय घरों तक पहुंचने वाला आकाशवाणी के अलावा यह अकेला माध्यम है। आज भी हर एक भारतीय को इस पर गर्व है कि उसके पास दूरदर्शन के रूप में टेलीविजन का गौरवशाली इतिहास मौजूद है। आज भी दूरदर्शन का नाम सुनते ही अतीत के कई खट्टे-मीठे अनुभव याद आ जाते हैं। आईए आज आपको बताते हैं दूरदर्शन के इतिहास की पूरी कहानी।
नई दिल्ली। भले ही आज टेलीविजन पर सैकड़ों चैनल प्रसारित हो रहे हों और उनमें दिखाए जाने वाले सीरियल व फिल्मों आदि की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त हो लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब केवल और केवल दूरदर्शन का राज चलता था। कौन याद नहीं करना चाहेगा उन सुनहरे दिनों को जब मोहल्ले के इक्के-दुक्के रइसों के घर में टीवी हुआ करता था और सारा मोहल्ला टीवी में आ रहे कार्यक्रमों को आश्चर्यचकित सा देखता था। अगर सिर्फ मनोरंजन की बात करें तो पारिवारिक कार्यक्रम ‘हमलोग’ ने तो लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये थे। इसके बाद आया भारत और पाकिस्तान के विभाजन की कहानी पर बना 'बुनियाद' जिसने विभाजन की त्रासदी को उस दौर की पीढ़ी से परीचित कराया। इस धारावाहिक के सभी किरदार आलोक नाथ(मास्टर जी), अनीता कंवर(लाजो जी), विनोद नागपाल, दिव्या सेठ, घर-घर में लोकप्रिय हो चुकी थे। फिर तो एक के बाद एक बेहतरीन और शानदार धारावाहिकों ने दूरदर्शन को घर-घर में पहचान दे दी। दूरदर्शन पर 1980 के दशक में प्रसारित होने वाले मालगड़ी डेज, ये जो है जिंदगी, रजनी, नुक्कड़, ही मैन, सिग्मा,स्पीड, जंगल बुक, वाह जनाब, कच्ची धूप, तमस, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, सुरभि, शांति चित्रहार, कथासागर, विक्रम बेताल आदि ने जो मिसाल कायम की है उसकी तुलना आज के शायद ही किसी धारावाहिक से न की जा सकती।
सात दशक पूर्व वर्ष 1959 में हुई शुरुआत
15 सितंबर 1959 को दिल्ली में दूरदर्शन का पहला प्रसारण प्रयोगात्मक आधार पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया था। किसी भी मीडिया के लिए पचास साल से ज्यादा का सफर बहुत मायने रखता है वक्त के साथ चलने में दूरदर्शन ने कई उतार-चढ़ाव तय किए हैं। बावजूद इसके यह सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के उद्देश्यों से डिगा नहीं है। अब तक दूरदर्शन ने जो विकास यात्रा तय की है वह काफी प्रेरणादायक है। वर्ष 1959 से लेकर 2013 तक के लगभग अपने सात दशक में दूरदर्शन हर वो मुकाम हासिल किया है जिसका उसने लक्ष्य बना रखा था। हालांकि दूरदर्शन की विकास यात्रा प्रारंभ में काफी धीमी रही लेकिन 1982 में रंगीन टेलीविजन आने के बाद लोगों का रूझान इस और ज्यादा बढ़ा और एशियाइ खेलों के प्रसारण ने तो क्रांति ही ला दी। वर्ष 2003 में तो दूरदर्शन ने पृथक रूप से विभिन्न भाषाओं में 24 घंटे का समाचार चैनल भी शुरू कर दिया।
संडे मतलब टोटल 'फन डे'
पुराने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के सामने बैठे किसान भाई 'कृषि दर्शन' और मूक बधिरों के समाचार बड़े चाव से देखते थे। बीच -बीच में आने वाले छोटे विजुअल्स जैसे 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' 'प्यार की गंगा बहे देश में एका रहे' 'स्कूल चलें हम' 'सूरज एक चंदा तारे अनेक' 'एक चिड़िया अनेक चिड़िया' 'एक अन्न का ये दाना सुख देगा मुझको मनमाना' आदि भी बहुत ही चाव से देखे जाते थे। रविवार का दिन तो मानो दूरदर्शन का ही होता था। लोग सुबह उठकर 'रंगोली' देखते, फिर नाश्ता लेकर टीवी से चिपक जाते। दोपहर में ही कुछ समय के लिए टीवी से अलग हटते थे फिर शाम को हर रविवार को दिखाई जाने वाली फिल्म देखने बैठ जाते थे। उस समय के संडे का मतलब होता था आजकल का टोटल 'फन डे'।
इन धारावाहिकों ने दिलाई घर-घर में पहचान
चंद्रकांता
चंद्रकांता 90 के दौर की सबसे फेमस टेलीविजन श्रृंखला थी, यह देवकी नंदन खत्री के उपन्यास पर आधारित थी। चंद्रकांता गुलेरी द्वारा निर्मित और सुनील अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित था। इसके 130 एपिसोड का प्रासारण 1994 से 1996 तक हुआ था। हमें पूरी उम्मीद है कि आपको इसका थीम सॉन्ग जरूर याद होगा। बाद में इसे सोनी टीवी पर भी प्रसारित किया गया।
रामायण
यह ऐतिहासिक पौराणिक धारावाहिक है जिसका निर्देशन रामानंद सागर ने किया था जो 25 जनवरी 1987 को टेलीवीजन पर मूलरूप से टेलीकास्ट हुआ। यह पौराणिक-धार्मिक धारावाहिकों में मील का पत्थर सिद्ध हुआ है। जिसे लोग यू-ट्यूब में अब भी देखना पसंद करते हैं।
अलिफ लैला
अलिफ लैला ने अपने नएपन से सभी को मोहित किया था। सागर फिल्म्स द्वारा निर्मित अलिफ लैला की यादों को भूल पाना मुश्किल है। 260 एपिसोड वाले इस धारावाहिक का थीम म्यूजिक फेसम सिंगर स्वर्गीय रविंद्र जैन ने दिया था।
शक्तिमान
हमें आज भी ऐसा लगता है कि शक्तिमान से बड़ा कोई सुपर हीरो हो ही नहीं सकता। इसे देख लेते थे तो सारा दिन दोस्तों से शक्तिमान की स्टाइल में फाइट करते थे। शक्तिमान मुकेश खन्ना द्वारा निर्मित और दिनकर जानी द्वारा निर्देशित था। दूरदर्शन पर श्रृंखला के लगभग 400 एपिसोड प्रसारित किए गए हैं।
तहकीकात
तहकीकात 90 के दशक में सर्वश्रेष्ठ जासूसी-थ्रिलर श्रृंखला बन गई थी, हलांकि इससे प्रेरित होकर कुछ लोग असल जिंदगी में भी जासूस बन बैठे। शेखर कपूर और करण राजदान द्वारा निर्देशित तहकीकात के 13 एपिसोड बनाए गए थे जिसे दूरदर्शन पर 1994 से 1995 के बीच प्रसारित किया गया था।
ब्योमकेश बक्शी
ब्योमकेश बक्शी के जीवन पर आधारित ब्योमकेश बक्शी पहली हिन्दी टेलीविजन श्रंखला थी। इस सिरीज ने जनता से काफी सराहनाएं बटोरी थी। 34 एपिसोड की इस सिरीज का निर्देशन बसु चटर्जी ने किया था। इसकी ओरिजनल रिलीज 1993 से 1997 है।
हमलोग
टेलीविजन के इतिहास में बहुचर्चित धारावाहिक हमलोग। इसमें मध्यम वर्ग की परेशानी को नाटकीय ढंग से दिखाया गया था। यह 7 जुलाई 1984 को टेलीकास्ट हुआ। जिसे लोकप्रिय लेखक मनोहर श्याम जोशी ने रचनाबद्ध किया था, यह 154 एपिसोड के साथ वर्ष 1985 में समाप्त हो गया था।
करमचंद
जासूसी धारावाहिक की बात करें तो इस समय सिर्फ क्राइम पेट्रोल और ऐतिहासिक सीआईडी ही याद आते हैं लेकिन जासूसी धारावाहिकों की फेहरिस्त में सबसे पहले करमचंद ने भारतीय टेलीविजन में कदम रखा। जो अपने सहायक के साथ अपराध के रहस्यों से पर्दा उठाता था। यह 1985 में प्रसारित हुआ। इसके निर्देशक पंकज पाराशर हैं।
-बॉक्स आफिस डेस्क


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