पुण्यतिथि पर विशेष : अंग्रेज फिरंगियों ने शहीद उधम सिंह के परिजनों पर भी ढ़हाए थे जुल्म, पढ़ें रूह कंपा देने वाली दास्तान
उधम सिंह के परिजनों को भी सूली पर चढ़ाना चाहती थी अंग्रेज सरकार
अंग्रेज सिपाहियों ने तलाश में छान मारा था पंजाब का सुनाम शहर
डर के मारे कई महीने जंगलों में छिपे रहे थे परिजन
79 साल पहले आज ही के दिन 31 जुलाई 1940 को लंदन में हिन्दुस्तानी जांबाज को लटका दिया था फांसी पर
मीडिया जंक्शन। संदीप कम्बोज
हिसार/सुनाम। 13 अप्रैल 1919 का वह जलियांवाला बाग नरसंहार। आखिर किसका बदन सिहर नहीं उठता अंग्रेज फिरंगियों की गोलियों की तड़तड़ाहट में मारे गए सैकड़ों निर्दोष हिन्दुस्तानियों की खून से सनी लाशों को याद कर। न जाने कितनी माताओं की गोद सूनी हो गई थी उस दिन और कितनी ही बहनों के माथे से सिंदुर गायब हो गया। किसी ने भाई खोया था तो किसी के सिर से हमेशा के लिए उठ गया था मां-बाप का साया। शायद ही कोई हिन्दुस्तानी हो जो अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर नहीं उठता होगा भारतीय इतिहास के इस काले दिन और जलियांवाला बाग का नाम सुनकर। 79 साल पहले आज ही के दिन 31 जुलाई 1940 को इंग्लैंड के लंदन स्थित पेंटनविले जेल में फांसी पर झूल जाने वाले शहीद उधम सिंह ने इन निर्दोष बहन-भाईयों की हत्या का बदला अंग्रेजों की सरजमीं पर जाकर लिया, वो भी 21 साल बाद। भारत माता के इस वीर सपूत ने जलियांवाला बाग नरसंहार के मुख्य आरोपी पंजाब के तत्कालिन गवर्नर माइकल ओ डायर को 13 मार्च 1940 के दिन उसी की सरजमीं पर उस समय गोलियों से भून डाला था जब वह लंदन के कैंक्स्टन हाल में जनसभा को संबोधित कर रहा था। लंदन में उधम सिंह को फांसी पर चढ़ा देने के बाद अंग्रेज सरकार हिन्दुस्तान के पंजाब प्रांत के सुनाम में रह रहे उनके परिजनों को भी फांसी पर लटका देना चाहती थी। ब्रिटिश हुकूमत ने उनके परिजनों को ढूंढ़ने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था लेकिन फिरंगी सिपाहियों से जान बचाने के लिए शहीद उधम सिंह के परिजन कई महीनों तक पहचान छुपाकर भूखे-प्यासे जंगलों की खाक छानते रहे। मीडिया जंक्शन ने जब शहीद उधम सिंह के वंशज भांजे खुशीनंद, पौत्र ज्ञान सिंह व पड़पौत्र हरपाल सिंह से बातचीत की तो अनेक वह चौंकाने वाले राज खुलकर सामने आए जिसके बारे में शायद आज तक भारतीय इतिहास भी अनभिज्ञ है।
उधम सिंह के घर लगा दिया था पहरा
उधम सिंह के भांजे खुशीनंद बताते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत को उनके क्रांतिकारी होने की भनक लग चुकी थी। अंग्रेज सिपाही उनकी हर गतिविधी पर नजर रखने लगे थे। वे बताते हैं कि अमृतसर में अनाथालय में रहते हुए उधम सिंह की मुलाकत एक लकड़ी के ठेकेदार से हुई जो उसे अफ्रिका ले गया। अफ्रिका से वह अमेरिका चले गये। अमेरिका में रहते हुए ही उनका पत्र व्यवहार सरदार भगत सिंह से हुआ। 1928 में भगत सिंह की प्रेरणा से जब वे कुछ रिवाल्वर व पिस्तौलें लेकर भारत लौटे तो लाहौर पहुंचने पर तलाशी के दौरान अंग्रेज सिपाहियों ने उन्हें हथियारों सहित गिरफ्तार कर लिया। चार साल बाद 1932 में वे जेल से रिहा हो गए। इस दौरान वे सुनाम अपने घर आते थे लेकिन रात 10 बजे के बाद और सुबह 4 बजे से पहले ही लौट जाते थे क्योंकि घर पर अंग्रेज फिरंगियों का पहरा रहता था। वे बताते हैं कि उन्होंने स्वंय उधम सिंह के साथ कई-कई दिन जंगलों में भूख-प्यास में गुजारे हैं। यही नहीं अंग्रेजों ने उधम सिेह की जानकारी न देने पर उनके घर के आस-पड़ौस में रहने वाले लोगों को भी जेलों में ठूंसकर अनेक यातनाएं दी थी। यह सिलसिला लगभग सालभर चलता रहा और 1933 में फिर वे जनरल ओ डायर की हत्या का मिशन लेकर इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए जो कि सात साल बाद 13 मार्च 1940 को कैंक्स्टन हॉल में पूरा हो गया।
38 साल बाद अस्थियां तो 77 साल बाद भारत को मिले अवशेष
शहादत के 38 साल बाद 1978 में पंजाब के तत्कालिन मुख्यमंत्री र्स्व. ज्ञानी जैल सिंह लंदन से शहीद उधम सिंह की अस्थ्यिां तो भारत ले आए थे जिनका परिजनों ने यहां अंतिम संस्कार कर दिया था लेकिन शहीद के अवशेष 77 साल बाद 31 जुलाई 2017 को भारत लाया गया जिन्हें अब जलियांवाला बाग में रखा गया है।
उधम सिंह के परिजनों को भी सूली पर चढ़ाना चाहती थी अंग्रेज सरकार
अंग्रेज सिपाहियों ने तलाश में छान मारा था पंजाब का सुनाम शहर
डर के मारे कई महीने जंगलों में छिपे रहे थे परिजन
79 साल पहले आज ही के दिन 31 जुलाई 1940 को लंदन में हिन्दुस्तानी जांबाज को लटका दिया था फांसी पर
मीडिया जंक्शन। संदीप कम्बोज
हिसार/सुनाम। 13 अप्रैल 1919 का वह जलियांवाला बाग नरसंहार। आखिर किसका बदन सिहर नहीं उठता अंग्रेज फिरंगियों की गोलियों की तड़तड़ाहट में मारे गए सैकड़ों निर्दोष हिन्दुस्तानियों की खून से सनी लाशों को याद कर। न जाने कितनी माताओं की गोद सूनी हो गई थी उस दिन और कितनी ही बहनों के माथे से सिंदुर गायब हो गया। किसी ने भाई खोया था तो किसी के सिर से हमेशा के लिए उठ गया था मां-बाप का साया। शायद ही कोई हिन्दुस्तानी हो जो अंग्रेजों के प्रति घृणा से भर नहीं उठता होगा भारतीय इतिहास के इस काले दिन और जलियांवाला बाग का नाम सुनकर। 79 साल पहले आज ही के दिन 31 जुलाई 1940 को इंग्लैंड के लंदन स्थित पेंटनविले जेल में फांसी पर झूल जाने वाले शहीद उधम सिंह ने इन निर्दोष बहन-भाईयों की हत्या का बदला अंग्रेजों की सरजमीं पर जाकर लिया, वो भी 21 साल बाद। भारत माता के इस वीर सपूत ने जलियांवाला बाग नरसंहार के मुख्य आरोपी पंजाब के तत्कालिन गवर्नर माइकल ओ डायर को 13 मार्च 1940 के दिन उसी की सरजमीं पर उस समय गोलियों से भून डाला था जब वह लंदन के कैंक्स्टन हाल में जनसभा को संबोधित कर रहा था। लंदन में उधम सिंह को फांसी पर चढ़ा देने के बाद अंग्रेज सरकार हिन्दुस्तान के पंजाब प्रांत के सुनाम में रह रहे उनके परिजनों को भी फांसी पर लटका देना चाहती थी। ब्रिटिश हुकूमत ने उनके परिजनों को ढूंढ़ने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था लेकिन फिरंगी सिपाहियों से जान बचाने के लिए शहीद उधम सिंह के परिजन कई महीनों तक पहचान छुपाकर भूखे-प्यासे जंगलों की खाक छानते रहे। मीडिया जंक्शन ने जब शहीद उधम सिंह के वंशज भांजे खुशीनंद, पौत्र ज्ञान सिंह व पड़पौत्र हरपाल सिंह से बातचीत की तो अनेक वह चौंकाने वाले राज खुलकर सामने आए जिसके बारे में शायद आज तक भारतीय इतिहास भी अनभिज्ञ है।
उधम सिंह के घर लगा दिया था पहरा
उधम सिंह के भांजे खुशीनंद बताते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत को उनके क्रांतिकारी होने की भनक लग चुकी थी। अंग्रेज सिपाही उनकी हर गतिविधी पर नजर रखने लगे थे। वे बताते हैं कि अमृतसर में अनाथालय में रहते हुए उधम सिंह की मुलाकत एक लकड़ी के ठेकेदार से हुई जो उसे अफ्रिका ले गया। अफ्रिका से वह अमेरिका चले गये। अमेरिका में रहते हुए ही उनका पत्र व्यवहार सरदार भगत सिंह से हुआ। 1928 में भगत सिंह की प्रेरणा से जब वे कुछ रिवाल्वर व पिस्तौलें लेकर भारत लौटे तो लाहौर पहुंचने पर तलाशी के दौरान अंग्रेज सिपाहियों ने उन्हें हथियारों सहित गिरफ्तार कर लिया। चार साल बाद 1932 में वे जेल से रिहा हो गए। इस दौरान वे सुनाम अपने घर आते थे लेकिन रात 10 बजे के बाद और सुबह 4 बजे से पहले ही लौट जाते थे क्योंकि घर पर अंग्रेज फिरंगियों का पहरा रहता था। वे बताते हैं कि उन्होंने स्वंय उधम सिंह के साथ कई-कई दिन जंगलों में भूख-प्यास में गुजारे हैं। यही नहीं अंग्रेजों ने उधम सिेह की जानकारी न देने पर उनके घर के आस-पड़ौस में रहने वाले लोगों को भी जेलों में ठूंसकर अनेक यातनाएं दी थी। यह सिलसिला लगभग सालभर चलता रहा और 1933 में फिर वे जनरल ओ डायर की हत्या का मिशन लेकर इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए जो कि सात साल बाद 13 मार्च 1940 को कैंक्स्टन हॉल में पूरा हो गया।
38 साल बाद अस्थियां तो 77 साल बाद भारत को मिले अवशेष
शहादत के 38 साल बाद 1978 में पंजाब के तत्कालिन मुख्यमंत्री र्स्व. ज्ञानी जैल सिंह लंदन से शहीद उधम सिंह की अस्थ्यिां तो भारत ले आए थे जिनका परिजनों ने यहां अंतिम संस्कार कर दिया था लेकिन शहीद के अवशेष 77 साल बाद 31 जुलाई 2017 को भारत लाया गया जिन्हें अब जलियांवाला बाग में रखा गया है।






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