पुणयतिथि पर विशेष : आज शहीद उधम सिंह जैसा बनने का संकल्प लेने का दिन

पुणयतिथि पर विशेष : आज शहीद उधम सिंह जैसा बनने का संकल्प लेने का दिन  

    आओ मिलकर करें शहादत को नमन्





सरदार उधम सिंह के इस महाबदले की कहानी आंदोलनकारियों कोप्रेरणा देती रही। तो आज इस महान  क्रांतिकारी उधम सिंह की शहादत को याद करने का दिन है, आज उधम सिंह को नमन करने का दिन है, आज शहीद उधम सिंह जैसा बनने का संकल्प लेने का दिन है। तो आईए हम भी संकलप लें कि कोई भी दुश्मन भारत माता के दामन को छूने तो क्या इसकी तरफ टेढ़ी नजर से देखने का भी दुस्साहस करे तो हम उसके लिए अपना सर्वसव न्यौछावर कर देंगे। आज ऐसे ही जज्बात पैदा करने का दिन है। 

सरदार उधम सिंह। भारतीय आजादी की लड़ाई में एक महान क्रांतिकारी। 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के गांव सुनाम में जन्में उधम सिंह का असली नाम शेर सिंह था। कम उम्र में ही माता-पिता का साया उठ जाने से उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा और अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। पापा सरदार तेहाल सिंह जम्मू उपल्ली गांव में रेलवे चौकीदार थे। पापा ने नाम दिया शेर सिंह। इनके एक भाई भी थे मुख्ता सिंह।  सात साल की उम्र में उधम अनाथ हो गए। पहले मां चल बसीं और उसके 6 साल बाद पिता।  मां-बाप के मरने के बाद दोनों को अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में रखवा दिया गया। वहां लोगों ने दोनों भाइयों को नया नाम दिया। शेर सिहं बन गए उधम सिंह और मुख्ता सिंह बन गए साधु सिंह। सरदार उधम सिंह ने भारतीय समाज की एकता के लिए अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है। साल 1917 में साधु की भी मौत हो गई। अब उधम बिल्कुल अकेले हो चुके थे। 1918 में उधम ने मैट्रिक के एग्जाम पास किए। साल 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया। 13 अप्रैल 1919 के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर अंग्रेज सिपाहियों ने सैकड़ों निर्दोष हिन्दुस्तानियों को मौत के घाट उतार दिया। उधम सिंह इस पूरे नरसंहार के गवाह थे। उन्होंने फिरंगियों का यह जुल्म अपनी आंखों से देखा था। यहीं पर उधम सिंह ने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर जनरल डायर और तत्कालीन पंजाब के गर्वनर माइकल ओह्ण ड्वायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली. इसके बाद वो क्रांतिकारियों के साथ शामिल हो गए। सरदार उधम सिंह क्रांतिकारियों से चंदा इकट्ठा कर देश के बाहर चले गए. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका, जिम्बॉब्वे, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा कर क्रांति के लिए खूब सारे पैसे इकट्ठा किए. इस बीच देश के बड़े क्रांतिकारी एक-एक कर अंग्रेजों से लड़ते हुए जान देते रहे। ऐसे में उनके लिए आंदोलन चलाना मुश्किल हो रहा था। पर वो अपनी प्रतीज्ञा को पूरी करने के लिए मेहनत करते रहे। उधम सिंह के लंदन पहुंचने से पहले जनरल डायर बीमारी के चलते मर गया था। ऐसे में उन्होंने अपना पूरा ध्यान माइकल ओ ड्वायर को मारने पर लगाया और उसे पूरा किया। सरदार उधम सिंह जलियांवाला बाग नरसंहार से आक्रोशित थे। इस आक्रोश का निशाना बना उस नरसंहार के वक़्त पंजाब का गवर्नर रहा माइकल फ्रेंसिस ओ ड्वायर 13 मार्च 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हॉल में बैठक थी. वहां माइकल ओ ड्वायर भी स्पीकर में से एक था। उधम सिंह उस दिन टाइम से वहां पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा रखी थी। पता है कैसे? उन्होंने किताब के पन्नों को रिवॉल्वर के शेप में काट लिया था. और बक्से जैसा बनाया था. उससे उनको हथियार छिपाने में आसानी हुई। बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ ड्वायर को निशाना बनाया। दो गोलियां लगी जिससे उसकी तुरंत मौत हो गई। इसके साथ ही उधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी छोड़ा नहीं करते। उधम सिंह चाहते तो वहां से भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और वे अरेस्ट हो गए। उन पर मुकदमा चला। कोर्ट में पेशी हुई। जज ने सवाल दागा कि वह ओ ड्वायर के अलावा उसके दोस्तों को क्यों नहीं मारा। उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई औरतें थीं। और हमारी संस्कृति में औरतों पर हमला करना पाप है। इसके बाद उधम को शहीद-ए-आजम की उपाधि दी गई, जो सरदार भगत सिंह को शहादत के बाद मिली थी। 4 जून, 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया। 31 जुलाई, 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह उधम सिंह भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में अमर हो गए। 1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए. अंग्रेजों को अंग्रेजों के घर में घुसकर मारने का जो काम सरदार उधम सिंह ने किया था, उसकी हर जगह तारीफ हुई। यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू ने भी इसकी तारीफ की। नेहरू ने कहा कि माइकल ओ ड्वायर की हत्या का अफसोस तो है, पर ये बेहद जरूरी भी था जिसने देश के अंदर क्रांतिकारी गतिविधियों को एकाएक तेज कर दिया। सरदार उधम सिंह के इस महाबदले की कहानी आंदोलनकारियों कोप्रेरणा देती रही। तो आज इस महान  क्रांतिकारी उधम सिंह की शहादत को याद करने का दिन है, आज उधम सिंह को नमन करने का दिन है, आज शहीद उधम सिंह जैसा संकल्प लेने का दिन है। तो आईए हम भी संकलप लें कि कोई भी दुश्मन भारत माता के दामन को छूने तो क्या इसकी तरफ टेढ़ी नजर से देखने का भी दुस्साहस करे तो हम उसके लिए अपना सर्वसव न्यौछावर कर देंगे। आज ऐसे ही जज्बात पैदा करने का दिन है।






Post a Comment

0 Comments