10 फरवरी 2020, 2:12 PM
हरियाणा मीडिया जंक्शन न्यूज
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति/जनजाति का उत्पीड़न रोकने से जुड़े कानून (एससी/एसटी एक्ट) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए साथ साफ कर दिया है कि अगर मामला पहली नजर में एससी/एसटी एक्ट के तहत नहीं पाया गया तो आरोपी को अग्रिम जमानत मिल सकती है। एफआईआर रद्द भी हो सकती है। हालांकि, एफआईआर दर्ज करने से पहले शुरूआती जांच और किसी आला पुलिस अफसर की मंजूरी जरूरी नहीं होगी। दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तार पर रोक लगाई थी। साथ ही आरोपियों को अग्रिम जमानत देने का प्रावधान किया था। इसके बाद सरकार ने कानून में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संशोधन बिल पास कराया था। जस्टिस अरुण मिश्र, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस रवींद्र भट की बेंच ने सोमवार को इस मामले में 2-1 से फैसला दिया, यानी दो जज फैसले के पक्ष में थे और एक ने इससे अलग राय रखी। बता दें कि 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने स्वत: संज्ञान लेकर एससी/एसटी एक्ट में आरोपियों की शिकायत के फौरन बाद गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। शिकायत मिलने पर एफआईआर से पहले शुरूआती जांच को जरूरी किया गया था। साथ ही अंतरिम जमानत का अधिकार दिया था। तब कोर्ट ने माना था कि इस एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी की व्यवस्था के चलते कई बार बेकसूर लोगों को जेल जाना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- गिरफ्तारी से पहले शिकायतों की जांच निर्दोष लोगों का मौलिक अधिकार है। 9 अगस्त 2018 को केंद्र सरकार फैसले के खिलाफ प्रदर्शनों के बाद एससी/एसटी एक्ट में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संसद में संशोधित बिल लेकर आई। इसके तहत एफआईआर से पहले जांच जरूरी नहीं रह गई। जांच अफसर को गिरफ्तारी का अधिकार मिल गया और अग्रिम जमानत का प्रावधान हट गया। वहीं 1 अक्टूबर 2019 को शीर्ष अदालत की 3 जजों की बेंच ने तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने के 2 जजों की बेंच के मार्च 2018 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा- एससी/एसटी समुदाय के लोगों को अभी भी देश में छुआछूत और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। उनका अभी भी सामाजिक रूप से बहिष्कार किया जा रहा है। देश में समानता के लिए अभी भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ है।
एफआईआर दर्ज करने से पहले जांच जरूरी नहीं
जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा- एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने के पहले जांच जरूरी नहीं है। साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मंजूरी लेने की जरूरत भी नहीं है। जस्टिस रविंद्र भट ने फैसले में कहा-हर नागरिक को दूसरे नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए। अगर शुरूआती तौर पर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस नहीं बनता, तो अदालत एफआईआर रद्द कर सकती है। ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का खुला इस्तेमाल संसद की मंशा के खिलाफ होगा।


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