लघुकथा-मुरब्बा नंबर


                                            लघुकथा-मुरब्बा नंबर

67 वर्षीय कुंदन के सवा एकड़ खेत में गेहूं की फसल पक कर सोने की तरह तैयार खड़ी थी। कुंदन फसल को देख खुद से ही मशविरा करता "मखां इब का तो 70 मण गिहूँ निकलने की उम्मीद आ, 5 मण कटाई दे का... अर 20 मण खाण जोगी राख का... डेढ़ मण ट्राली का किराया दे का 46-47 मण तो आढ़तिये के बार मा पहुंच जा गी।" अपनी बुद्धि के अनुसार कुंदन फसल कटाई से पहले ही उस का मान अनुमान लगाता रहता और भीतर ही भीतर खुश होता रहता। कुंदन का बेटा और बहू गांव के अधिकतर लोगों की तरह इस साल काम की तलाश में पास के शहर में स्थापित हो गए थे और पत्नी दमे की मरीज होने के चलते बामुश्किल चूल्हा चौका ही कर पाती, इसलिए कुंदन चाह कर भी खुद अपनी गेहूं को हर वर्ष की भांति खुद नहीं काट सकता था। कुंदन ने गांव में फसल कटाई दस्ते के मुखिया से गेहूं काटने की बात की मगर 6 मण गेहूं, चार पल्ली भूसा, दो वक्त की चाय और कटाई तक हर रोज हरा चारा देने में असमर्थ वो कंबाइन को बेहतर विकल्प मानकर वहां से लौट आया। कुंदन को फसल कटाई की जल्दी थी क्योंकि बारूद की तरह पक कर खड़ी फसल किसी भी वक्त किसी भयानक हादसे को न्योता दे सकती थी। कुंदन दिन चढ़ते ही दरांती हाथ में पकड़ खेत पहुंच जाता और गेहूं के खेत के चारों ओर खड़ी सरसों की कटाई करते हुए रुक-रुक कर खड़ी फसल को निहारता और पास से गुजरती किसी कंबाइन मशीन का इंतजार करता क्योंकि सवा एकड़ की फसल कटाई के लिए कोई भी कंबाइन वाला स्पेशल आने को तैयार नहीं था। आज जैसे ही कुंदन गांव से निकला तो उसे खेत के पास कंबाइन चलती नजर आई, "मखां सुण ली आज तो पक्के पुलां आले ना!" बुड़बुड़ाते हुए कुंदन उस खेत की तरफ बढ़ा जहां वो कंबाइन गेहूं काट रही थी। खेत के मालिक परसा राम नम्बरदार जो कि टयूबवैल के हौद पर बैठा मूछों को ताव दे रहा था। पास पहुंचते कुंदन "मखां राम-राम नम्बरदार"  "राम-राम कुंदन" बोल नम्बरदार ने ऊपर से नीचे तक कुंदन का मुआयना करती निगाह से देखा। "मखां नम्बरदार गेल लगदी मेरी आली सवा किला भी कटवा दे ! मारे आला इब का पल्लेदारी मा लग गया शहर मा" कह कुंदन ने एक ही सांस में अपनी मजबूरी और गुजारिश बयान की। "रै कहाँ! मसयों फसया यो कंबाइन आला, दिन-रात मा जोर ला का मारे 17  किले ही काट ग यो... अर तेरे ते कहया था ठेके पा दे का पासै कर" बोल नम्बरदार ने गरीब कुंदन को जवाब-हीन वापिस लौटने पर मजबूर कर दिया था। कुंदन लौट रहा था तो नम्बरदार ने पीछे से उसे ऊंची आवाज में "रै कुंदन! इब का पानी का जुगाड़ देख लिए भई अपना, मारा तो अपना ही नी पूरा पड़दा।" कुंदन वापिस लौट मुरबा नंबर पत्थर पर बैठ कभी अपनी सवा एकड़ जमीन में खड़ी फसल को देखता तो कभी हाथों में पड़ी दरारों को। कुंदन न जाने किन ख्यालों में खोया हुआ था और नम्बरदार समेत पास के खेतों के किसान और कंबाइन चालक उस के खेतों की ओर दौड़ रहे थे मगर कुंदन खेत में खड़े आदम बुत सा सुन्न बैठा था। कुछ ही पलों में पास के खेत मे चलती कंबाइन से उठी चिंगारी और हवा के रुख ने साथ लगती कुंदन की गेहूं की फसल को जला कर राख कर दिया था लेकिन कुंदन निश्चिंत लेटा था तमाशबीन लोगों की भीड़ के दरमयां... अपनी अंतिम सांस निपटा।
दिलबाग सिंह गुराया
लौटनी, कुरूक्षेत्र। 

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