अपना-सा एक सपना
सपना
बचपन में ही
पलने लगता है
मन में
आँखों में
जिंदगी में
बाल्यावस्था से
बड़े होने तक
वह
कितने रंगों से
सजता है
अपने को
पूरा करने की
जिद्द पकड़ता है
उत्साह भर
अपने में
खूब अक ड़ता है
भले ही
बचपन का खास सपना
पूरा न हो
पर
जेहन पर
वह इस कदर
जम जाता है
जैसे
कभी पिघलेगा ही नहीं
वह सपना
खूब अपनापन
दर्शाता है
पर
हम उसकी जिद्द
उसके उत्साह
उसकी उम्मीद क ो
समझ नहीं पाते
अपने-से उस सपने को
मन में
आँखों में
जिंदगी में
कभी सजा नहीं पाते।
-बलराज ‘स्नेही’
जीन्द, हरियाणा


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