कविता : फसल


    कविता : फसल
छोटी सी जोत है जिस में कर्ज उठा कुछ बीज बिखेरे हैं,
मालूम है कि बिजाई से कटाई तक सितम बहुतेरे हैं।
उग आयेंगे तो कुछ राहत मिलेगी दिल ओ दिमाग को,
क्योंकि कमीशनखोरी के धंधे में बिकते बहुत अंधेरे हैं।
बच्चों के हिस्से का दूध बेचकर पालन पोषण करना है,
सुना है घनी अंधेरी रातों के उस पार सुनहरी सवेरे हैं।
पसीने से ही सींच लूंगा गर आसमान से पानी न बरसा,
सुरक्षा के लिए करने तैयार, बच्चे बुढेÞ हाथों के घेरे हैं।
खुले आसमां के नीचे मेरी फसल बारूद सी पड़ी होगी,
रब की रजा माननी होगी कि दाने उसके हैं या मेरे हैं।
खुद ही करनी होगी कटाई हाथों से उगाई फसल की,
"बाग" इल्म है मुझ कम-जोती को मिलने कहाँ कमेरे हैं।
-दिलबाग सिंह गुराया

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