लघुकथा : चुनाव के दिन चार


                 लघुकथा चुनाव के दिन चार 

वे आते ही चेहरे पे खुशी छा जाती है आंखों में सुरूर आ जाता है। वे आते ही सालों से पीहर में जड़ जमाए बैठी बिजली रानी ससुराल का रास्ता निहारने लगती है। वे आते ही हवा से फोग गायब हो जाता है और सम्मोहन की गंध पसरने लगती है। वे आते ही मोहल्लों के जंग खाए नलों में भी पानी की फुहार होने लगती है। वे आते ही अस्पतालों में डॉक्टर, पुलिस थानों में थानेदार, स्कूलों में शिक्षक आने लग जाते हैं। वे आते ही भय का वातावरण सुरक्षा के सुख में तब्दील हो जाता है। वे आते ही भूखों को भोजन, राशन कार्ड धारकों को सस्ता राशन मिलने लग जाता है। वे आते ही कंबल, साड़ी, सिलाई मशीन, रेडियो, मोबाइल, टीवी, फ्रिज की खैरात बंटने लग जाती है। उनके इंतजार में जनता शबरी से भी ज्यादा व्याकुल रहती है। पूरे पांच साल का वनवास काटकर वे दस्तक जो देते हैं। भले ही वे चार दिन ठहरते हैं। लेकिन वे चार दिन हमें जीवन के चार सौ साल का अहसास करा जाते हैं। अंधेरी रातों में जुगनू की लौ से दीप्तिमान होने वाले हम ट्यूबलाइट और बल्ब की दूधिया रोशनी की शोभा पाकर कुसुमित हो जाते हैं। उनके आते ही हमें लगने लगता है कि देश में अभी लोकतंत्र नाम की गौरैया पुन: रूप से विलुप्त नहीं हुई है। वे आते हैं तो जैसे पतझड़ में भी बसंत छा जाता है। जैसे मधुमास में अमलतास खिलने लग जाता है। जैसे नवयुवती का यौवन कालबेलिया नृत्य करने लग जाता है। जैसे बिन होली के ही नशे में धुत्त बुजुर्ग गालियों से अपने वाक्य विन्यास को अलंकृत करने लग जाते हैं। उनका आना हमारे टूटी तकदीर का चमकना है। उनका आना चिड़ियों का चहकना है। वे आते हैं तो मानो रामराज्य पुन: लौटने लगता है। लेकिन वे जैसे अपना एक निर्दयी दूत हमारी निगरानी के लिए छोड़कर चले जाते हैं तो हमें उन पर बहुत ही गुस्सा आने लगता है। चार दिनों के आनंद के बाद चार साल तक उस निर्दयी दूत के अत्याचारों से हमारा जिस्म छलनी-छलनी होने लगता है। दूत की दानवता के कारण नल से पानी,रात को बिजली रानी सभी रुखसत हो जाते हैं। दूत की दैन्य नीतियों के कारण स्कूलों में शिक्षक, अस्पतालों में डॉक्टर और थानों में थानेदार तक गायब हो जाते हैं। महंगाई मुजरा करने लगती है, बेरोजगारी बीन बजाती है, भुखमरी डरी-डरी रहती है, गरीबी भी घबरा जाती है। उनका चार दिन की चांदनी देकर चार साल तक हमें शैतानों के हाथों छोड़कर बिछुड़ना हमारी सजी-सवरी तकदीर का पुन: टूटना है। भोली भाली जनता का दूत द्वारा लूटना है। मलाई खाने के बाद मार खाने का अभ्यास नहीं होने के कारण दर्द का अहसास दोगुना होने लगता है। उनके जाते ही हम यह भूल गए हैं कि हम भी मतदाता है। अरे हमारा भी महत्व है लेकिन लगता है वह महत्व महत्वहीन हो गया है। और सारा माहौल पहले से ज्यादा गमगीन हो गया है।
- देवेन्द्रराज सुथार
आतमणावास, बागरा,जालोर, राजस्थान


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