लघुकथा : 'कूटनीति'
जंगल में चुनाव होने वाले थे। मतदान के तारीखों का ऐलान हो चुका था। चुनाव जीतने के लिए इस बार शेर ने कूटनीति अपनाई। उसने जंगल में यह घोषणा करवा दी, 'जब तक चुनाव नहीं हो जाते जंगल में कोई भी मांसाहारी जंतु दूसरे किसी जानवर का शिकार नहीं करेगा। सभी जानवरों को शुद्ध शाकाहारी रहना होगा। अगर किसी भी जानवर ने किसी दूसरे प्राणी का शिकार किया और मुझे जानकारी मिल गई तो मैं उसे कठोर से कठोर दंड दूंगा।' इस घोषणा से जंगल के सारे शाकाहारी प्राणी निडर होकर विचरण करने लगे। दो-तीन दिन बाद ही एक दोपहर सियार की आंतें ऐंठने लगीं। जब भूख सहन नहीं हुई तो वह शेर के पास पहुंचा और बोला, 'दादा बड़ी जोरों की भूख लगी है, आखिर ऐसा कब तक चलेगा? अभी तो कई दिन बाकी हैं वोट पड़ने में, अब तो शिकार करने की छूट दे दो।'शेर ने सियार का कंधा थपथपाते हुए कहा, 'अरे मूर्ख कुछ दिन और सब्र कर ले, कुछ समय शाकाहारी बना रह। चुनाव सिर पर हैं और मुझे किसी भी कीमत पर इसे जीतना ही है। एक बार मैं जीत लूं फिर तू कर लेना जी भर अपनी मनमानी। तब तुझे मैं भी नहीं रोकूंगा। अरे बावले, तुझे मालूम है, इंसानों की बस्ती के चुनाव में भी ऐसा ही होता है। चुनाव से पहले, सब बड़े-बड़े वादे करते हैं और जीतते ही सब अपनी मनमानी पर उतर आते हैं। कोई कुछ नहीं कर पाता। कुछ समझा...'


0 Comments