भई वाह ! कारगर साबित हो रही पौधारोपण की यह मटका थैरेपी तकनीक
पौधारोपण कर रही संस्थाओं को जागरूक कर रहा राह ग्रुप
इस तकनीके के तहत 90 फीसदी तक कम देना होगा खाद व पानी
साधारण रुप से लगे पौधे की तुलना में दो से तीन गुणा गति से बढ़ता है इस तकनीक से लगा पौधा
राजस्थान में बेदह कारगर साबित होगी प्लांटेशन विद् मटका थरेपी
5 अगस्त 2019, 1:15 AM
संदीप कम्बोज। मीडिया जंक्शन
हिसार। राह ग्रुप फाउंडेशन की हिसार ईकाई ने सोमवार को मटका थरैपी/तकनीक से पौधारोपण कर पौधागिरी अभियान से जुड़े विद्यार्थियों व प्रदेश के किसानों व पर्यावरण प्रेमियों को नई तकनीक से पौधगिरी की प्रेरणा देने का काम किया है। सोमवार को राह क्लब हिसार के महत्वांकांक्षी प्रोजक्ट पौधारोपण विद्व मटका थरैपी के अर्न्तगत राह ग्रुप के वाईस चेयरमैन व लक्ष्य पब्लिक स्कूल के निदेशक रामनिवास वर्मा की अगवाई में गांव तलवंडी राणा के श्मशान घाट व दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर 121 पौधे लगाए गए। यह जानकारी देते हुए राह क्लब हिसार के अध्यक्ष मास्टर रामअवतार वर्मा ने बताया कि प्लांटेशन विद् मटका थरेपी के अर्न्तगत तलवंडी राणा में नीम, बरगद, पीपल, गुलमोहर, अमरुद, नीबू, जांटी सहित फल और छायादार पेड़ों के पौधे लगाए गए। प्रोजक्ट इंचार्ज रामनिवास वर्मा धान्सू ने बताया कि इनमें से 101 पौधे मटका पद्धति से लगाए गए हैं ताकि पानी, मेहनत और समय की बचत हो सके। उनके अनुसार इन पौधों की सुरक्षा तथा लगातार देखभाल ग्रांम पंचायत तलवंडी राणा करेगी। इससे पहले सरपंच महेन्द्र कोहली ने राह संस्था के पदाधिकारियों व दूसरे मेहमानों का गांव में पौधारोपण करने आने पर भव्य स्वागत किया। इस दौरान राह ग्रुप के राष्ट्रीय चेयरमैन नरेश सेलपाड़, वाईस चेयरमैन रामनिवास वर्मा, सांस्कृतिक प्रभारी साधुराम जाखड़, राह क्लबों के हरियाणा प्रभारी कमल हांडा, राह क्लब हिसार के अध्यक्ष रामअवतार वर्मा, उपाध्यक्ष सूर्यकांत शर्मा, सचिव विजेन्द्र सैनी, सह-सचिव सोनू सैनी, विपुल सैनी, सेल्फ डिफेंस हरियाणा प्रभारी कोच निरज वर्मा, सेल्फ डिफेंस प्रभारी हिसार निर्मला सैनी, कोच बलराज यादव, कोच उमेश, तकनीकी शिक्षा प्रभारी अमित लांबोरिया, कोषाध्यक्ष निरज सहरावत, समाजसेविका अनू चिनिया सहित भारी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद रहे।
क्या है प्लांटेशन विद् मटका थरेपी
राह ग्रुप फाउंडेशन के वाईस चेयरमैन रामनिवास वर्मा के अनुसार इसके लिए जरूरी सामग्री जैसे पुराना मटका और जूट या सूत की रस्सी की जरुरत पड़ती है। यह सामग्री अधिकांश हर जगह आसानी से उपलब्ध हो जाती है। क्योंकि हर परिवारों में गर्मियों के बाद घर का मटका बदला ही जाता है। इस पद्धति में पौधों रोपने के समय ही उसी गड्डे के अंदर मटके को रख दिया जाता है। इस मटके की तली में एक छेद किया जाता है, जिसमें जूट या सूत की रस्सी पौधे की जड़ों तक पहुंचाई जाती है। इसके बाद मटके के निचले हिस्से को भी पौधे की जड़ों की तरह खोदी गई मिट्टी से ढंक दिया जाता है। गड्ढा भरने के लिए मिट्टी, रेत और गोबर का खाद भी आसपास डाली जाती है। यह ध्यान रखा जाता है कि मटके का मुंह खुला रहे। धूप या प्रदूषण से बचाने के लिए इसे कपड़े से ढंका जा सकता है।
बचेगा 90 फीसदी पानी
मटका पद्धति पौधों में पानी देने की नई पद्धति है। इसके माध्यम से पौधों की जड़ों तक बंूद-बूंद पानी पहुंंचाया जा सकता है, जिससे पानी की बचत होती है, साथ ही पौधों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। सूखे क्षेत्रों के लिए यह पद्धति बहुत ही कारगर साबित हो सकती है। जिसके कारण अब मटका पद्धति से पौधरोपण किया जा रहा है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इसका इस्तेमाल करने से पौधे के बड़े होने तक लगातार इसका उपयोग किया जा सकता है और बहुत ही कम संसाधन और सरल तकनीक होने से पौधे का विकास भी पहले से तीन गुणा तेजी से होता है।
राजस्थान व पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान
राह ग्रुप फाउंडेशन के राष्ट्रीय चेयरमैन नरेश सेलपाड़ के अनुसार पानी की कमी तथा पहाड़ी और ढलान के भौगोलिक क्षेत्र के लिए यह तकनीक बेहद कारगर साबित है। इसके अलावा अम्लीय, लवणीय या अन्य प्रकार की अशुद्धियों वाले पानी की स्थिति में भी इस तकनीक से कम पानी में अधिक संख्या में पौधों की सिंचाई की जा सकती है। उनके अनुसार करनाल के केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसन्धान संस्थान ने तो बाकायदा घड़ा सिंचाई तकनीक से पौधारोपण की सिफारिश की है।
सात दिन तक नहीं पड़ेगा पानी
मटका तकनीक से यह फायदा होता है कि आप एक बार मटके को पानी से भर देंगे तो अगले सात दिनों तक आपको फिर पौधे को पानी देने की जरूरत नहीं होगी। मटके की तली में लगी जूट या सूत की रस्सी बूंद-बूंद कर टपकते हुए पौधे की जड़ों तक पानी पहुंचाती रहेगी। जैसे-जैसे पौधा पानी लेता रहेगा। वैसे-वैसे मटके में पानी कम होता जाएगा। इस तरह तो पानी समय और मेहनत की बचत होती है। साथ ही पौधा भी तेज गति से बढ़ता है, क्योंकि उसमें जरूरत के अनुसार नमी बनी रहती है। जबकि साधारण पद्वति में पौधों को ऊपर से पानी डालने के बाद तेज धूप के कारण अधिकांश पानी उसी दिन सूख जाता है। यह पद्धति काफी कारगर साबित होती है।
खेती में भी कारगर
बहुत ही कम संसाधन और सरल सी इस तकनीक के अपनाने से ही पौधे का विकास भी तेजी से होता है। इसके जरिए फलों और सब्जियों की खेती भी की जा सकती है। इसमें सबसे कम मात्रा में पानी की खपत होती है यानी पानी की ज्यादा-से-ज्यादा बचत की जा सकती है। अब देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी इस पद्धति से पौधों को पानी दिया जा रहा है।
पौधारोपण कर रही संस्थाओं को जागरूक कर रहा राह ग्रुप
इस तकनीके के तहत 90 फीसदी तक कम देना होगा खाद व पानी
साधारण रुप से लगे पौधे की तुलना में दो से तीन गुणा गति से बढ़ता है इस तकनीक से लगा पौधा
राजस्थान में बेदह कारगर साबित होगी प्लांटेशन विद् मटका थरेपी
5 अगस्त 2019, 1:15 AM
संदीप कम्बोज। मीडिया जंक्शन
हिसार। राह ग्रुप फाउंडेशन की हिसार ईकाई ने सोमवार को मटका थरैपी/तकनीक से पौधारोपण कर पौधागिरी अभियान से जुड़े विद्यार्थियों व प्रदेश के किसानों व पर्यावरण प्रेमियों को नई तकनीक से पौधगिरी की प्रेरणा देने का काम किया है। सोमवार को राह क्लब हिसार के महत्वांकांक्षी प्रोजक्ट पौधारोपण विद्व मटका थरैपी के अर्न्तगत राह ग्रुप के वाईस चेयरमैन व लक्ष्य पब्लिक स्कूल के निदेशक रामनिवास वर्मा की अगवाई में गांव तलवंडी राणा के श्मशान घाट व दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर 121 पौधे लगाए गए। यह जानकारी देते हुए राह क्लब हिसार के अध्यक्ष मास्टर रामअवतार वर्मा ने बताया कि प्लांटेशन विद् मटका थरेपी के अर्न्तगत तलवंडी राणा में नीम, बरगद, पीपल, गुलमोहर, अमरुद, नीबू, जांटी सहित फल और छायादार पेड़ों के पौधे लगाए गए। प्रोजक्ट इंचार्ज रामनिवास वर्मा धान्सू ने बताया कि इनमें से 101 पौधे मटका पद्धति से लगाए गए हैं ताकि पानी, मेहनत और समय की बचत हो सके। उनके अनुसार इन पौधों की सुरक्षा तथा लगातार देखभाल ग्रांम पंचायत तलवंडी राणा करेगी। इससे पहले सरपंच महेन्द्र कोहली ने राह संस्था के पदाधिकारियों व दूसरे मेहमानों का गांव में पौधारोपण करने आने पर भव्य स्वागत किया। इस दौरान राह ग्रुप के राष्ट्रीय चेयरमैन नरेश सेलपाड़, वाईस चेयरमैन रामनिवास वर्मा, सांस्कृतिक प्रभारी साधुराम जाखड़, राह क्लबों के हरियाणा प्रभारी कमल हांडा, राह क्लब हिसार के अध्यक्ष रामअवतार वर्मा, उपाध्यक्ष सूर्यकांत शर्मा, सचिव विजेन्द्र सैनी, सह-सचिव सोनू सैनी, विपुल सैनी, सेल्फ डिफेंस हरियाणा प्रभारी कोच निरज वर्मा, सेल्फ डिफेंस प्रभारी हिसार निर्मला सैनी, कोच बलराज यादव, कोच उमेश, तकनीकी शिक्षा प्रभारी अमित लांबोरिया, कोषाध्यक्ष निरज सहरावत, समाजसेविका अनू चिनिया सहित भारी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद रहे।
क्या है प्लांटेशन विद् मटका थरेपी
राह ग्रुप फाउंडेशन के वाईस चेयरमैन रामनिवास वर्मा के अनुसार इसके लिए जरूरी सामग्री जैसे पुराना मटका और जूट या सूत की रस्सी की जरुरत पड़ती है। यह सामग्री अधिकांश हर जगह आसानी से उपलब्ध हो जाती है। क्योंकि हर परिवारों में गर्मियों के बाद घर का मटका बदला ही जाता है। इस पद्धति में पौधों रोपने के समय ही उसी गड्डे के अंदर मटके को रख दिया जाता है। इस मटके की तली में एक छेद किया जाता है, जिसमें जूट या सूत की रस्सी पौधे की जड़ों तक पहुंचाई जाती है। इसके बाद मटके के निचले हिस्से को भी पौधे की जड़ों की तरह खोदी गई मिट्टी से ढंक दिया जाता है। गड्ढा भरने के लिए मिट्टी, रेत और गोबर का खाद भी आसपास डाली जाती है। यह ध्यान रखा जाता है कि मटके का मुंह खुला रहे। धूप या प्रदूषण से बचाने के लिए इसे कपड़े से ढंका जा सकता है।
बचेगा 90 फीसदी पानी
मटका पद्धति पौधों में पानी देने की नई पद्धति है। इसके माध्यम से पौधों की जड़ों तक बंूद-बूंद पानी पहुंंचाया जा सकता है, जिससे पानी की बचत होती है, साथ ही पौधों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। सूखे क्षेत्रों के लिए यह पद्धति बहुत ही कारगर साबित हो सकती है। जिसके कारण अब मटका पद्धति से पौधरोपण किया जा रहा है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि इसका इस्तेमाल करने से पौधे के बड़े होने तक लगातार इसका उपयोग किया जा सकता है और बहुत ही कम संसाधन और सरल तकनीक होने से पौधे का विकास भी पहले से तीन गुणा तेजी से होता है।
राजस्थान व पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान
राह ग्रुप फाउंडेशन के राष्ट्रीय चेयरमैन नरेश सेलपाड़ के अनुसार पानी की कमी तथा पहाड़ी और ढलान के भौगोलिक क्षेत्र के लिए यह तकनीक बेहद कारगर साबित है। इसके अलावा अम्लीय, लवणीय या अन्य प्रकार की अशुद्धियों वाले पानी की स्थिति में भी इस तकनीक से कम पानी में अधिक संख्या में पौधों की सिंचाई की जा सकती है। उनके अनुसार करनाल के केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसन्धान संस्थान ने तो बाकायदा घड़ा सिंचाई तकनीक से पौधारोपण की सिफारिश की है।
सात दिन तक नहीं पड़ेगा पानी
मटका तकनीक से यह फायदा होता है कि आप एक बार मटके को पानी से भर देंगे तो अगले सात दिनों तक आपको फिर पौधे को पानी देने की जरूरत नहीं होगी। मटके की तली में लगी जूट या सूत की रस्सी बूंद-बूंद कर टपकते हुए पौधे की जड़ों तक पानी पहुंचाती रहेगी। जैसे-जैसे पौधा पानी लेता रहेगा। वैसे-वैसे मटके में पानी कम होता जाएगा। इस तरह तो पानी समय और मेहनत की बचत होती है। साथ ही पौधा भी तेज गति से बढ़ता है, क्योंकि उसमें जरूरत के अनुसार नमी बनी रहती है। जबकि साधारण पद्वति में पौधों को ऊपर से पानी डालने के बाद तेज धूप के कारण अधिकांश पानी उसी दिन सूख जाता है। यह पद्धति काफी कारगर साबित होती है।
खेती में भी कारगर
बहुत ही कम संसाधन और सरल सी इस तकनीक के अपनाने से ही पौधे का विकास भी तेजी से होता है। इसके जरिए फलों और सब्जियों की खेती भी की जा सकती है। इसमें सबसे कम मात्रा में पानी की खपत होती है यानी पानी की ज्यादा-से-ज्यादा बचत की जा सकती है। अब देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी इस पद्धति से पौधों को पानी दिया जा रहा है।




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