मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने प्रदेश के किसानों से किया आह्वान
हरियाणा मीडिया जंक्शन
चंडीगढ़। कोरोना संकट के मद्देनजर बिहार, उत्तर प्रदेश व देशके अन्य हिस्सों से आए प्रवासी मजदूरों का पलायन शुुरु हो गया है। सरकार ने इन मजदूरों के घर वापसी के पूरे बंदोबस्त कर दिए हैं । तो इस बार किसानों को धान रोपाई में बड़ी समस्या होने वाली है क्योंकि हरियाणा में ये प्रवासी मजदूर ही हर साल लाखों एकड़ जमीन पर धान रोपाई करते आ रहे हैं। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने भी प्रदेश के किसानों से इस बार धान की रोपाई न करने की अपील की है। सीएम ने किसानों से कहा है कि रबी फसल की कटाई के बाद अब खरीफ फसलों की बुआई की तैयारी करने का समय आ गया है और धान के स्थान पर कम पानी से तैयार होने वाली अन्य वैकल्पिक फसलें जैसे कि मक्का, अरहर, ग्वार, तिल, ग्रीष्म मूंग (बैशाखी मूंग) व अन्य फसलों की बुआई करें। इससे हम भावी पीढ़ी के लिए पानी की बचत सुनिश्चित करने के साथ-साथ सरकार के ह्यजल ही जीवन हैह्ण अभियान को भी आगे बढ़ा सकेंगे।मुख्यमंत्री ने बताया कि डार्क जोन, दिन-प्रतिदिन गिरता भू-जल तथा भू-जल का अत्यधिक दोहन हमारे लिए चुनौती बन गए हैं और आने वाली पीढिय़ों के लिए इन्हीं चुनौतियों का समाधान निकालने की हमने शुरूआत की है। दुनिया भर में ऐसा माना जा रहा है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध होगा तो वह पानी के लिए होगा। इसलिए हमें भावी पीढ़ी के लिए अभी से ही पानी का संरक्षण करना होगा। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि अगर हम अपने जीवन में भावी पीढ़ी के लिए कुछ छोडकर जाएं तो पानी से बेहतर कोई विकल्प नहीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे पूर्व भी वे इसके बारे किसान संघों के नेताओं से भी अपील कर चुके हैं वे किसानों को धान की बजाय अन्य वैकल्पिक फसलें की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने यह भी बताया कि इस दिशा में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग भी जल संरक्षण की नई योजनाएं तैयार कर रहा है और इसमें किसान नेताओं व प्रगतिशील किसानों से सुझाव आमंत्रित किये गए हैं। मुख्यमंत्री ने किसानों से भी आह्वान किया है कि वे भी अपने सुझाव विभाग को भिजवाएं। सीएम ने कहा कि हमें आमजन तक यह संदेश देना होगा कि पानी बचाना है तो धान नहीं लगाना है बल्कि धान के स्थान पर इसके बराबर आमदनी वाली फसलें उगानी हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि चरखी दादरी जिले की ग्राम पंचायत पैंतावास कलां ने अपने गांव में धान की फसल न बोने का संकल्प लेकर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जोकि किसी भी पंचायत के लिए एक बड़ी सोच है और यह प्रदेश की अन्य पंचायतों के लिए भी एक प्रेरणा का काम करेगी।
एक किग्रा. चावल उगाने पर खर्च होता है 3 से 5 हजार लीटर पानी
मुख्यमंत्री ने किसानों से यह भी अपील की है कि जो किसान पंचायती जमीन ठेके पर लेकर खेती करते हैं वे धान के स्थान पर मक्का, अरहर व अन्य फसलों की ही बुआई करें और सरकार द्वारा चलाए जा रहे ह्यजल ही जीवन हैह्ण अभियान को सफल बनाने में अपना योगदान दें। उन्होंने कहा कि हमें यह बात समझनी चाहिए कि एक किलोग्राम चावल उगाने पर 3000 से 5000 लीटर पानी की खपत होती है। उन्होंने कहा कि इस बार कोरोना महामारी के चलते धान की रोपाई के लिए प्रवासी मजदूरों की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या बन गई है। मुख्यमंत्री ने किसानों से यह भी अपील की है कि वे गेहूं की फसल की कटाई के बाद धान की बजाय ढैंचा लगाएं, जो पशु चारे के साथ-साथ हरी खाद का काम भी करता है। आमतौर पर किसान कुछ समय बाद ढैंचे की फसल की खेत में जुताई कर देता है और इससे भूमि की उर्वरक शक्ति भी बढ़ती है। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा हरियाणा बीज विकास निगम के माध्यम से प्रदेश में ढैंचा का लगभग 29 हजार क्विंटल बीज उपलब्ध करवाया गया है। इसलिए जो किसान ढैंचा लगाने के इच्छुक हैं तो वे मंडियों से जब गेहूं की फसल बेचकर जाएं तो हरियाणा बीज विकास निगम के केन्द्रों से बीज लेकर जाएं।
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चंडीगढ़। कोरोना संकट के मद्देनजर बिहार, उत्तर प्रदेश व देशके अन्य हिस्सों से आए प्रवासी मजदूरों का पलायन शुुरु हो गया है। सरकार ने इन मजदूरों के घर वापसी के पूरे बंदोबस्त कर दिए हैं । तो इस बार किसानों को धान रोपाई में बड़ी समस्या होने वाली है क्योंकि हरियाणा में ये प्रवासी मजदूर ही हर साल लाखों एकड़ जमीन पर धान रोपाई करते आ रहे हैं। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने भी प्रदेश के किसानों से इस बार धान की रोपाई न करने की अपील की है। सीएम ने किसानों से कहा है कि रबी फसल की कटाई के बाद अब खरीफ फसलों की बुआई की तैयारी करने का समय आ गया है और धान के स्थान पर कम पानी से तैयार होने वाली अन्य वैकल्पिक फसलें जैसे कि मक्का, अरहर, ग्वार, तिल, ग्रीष्म मूंग (बैशाखी मूंग) व अन्य फसलों की बुआई करें। इससे हम भावी पीढ़ी के लिए पानी की बचत सुनिश्चित करने के साथ-साथ सरकार के ह्यजल ही जीवन हैह्ण अभियान को भी आगे बढ़ा सकेंगे।मुख्यमंत्री ने बताया कि डार्क जोन, दिन-प्रतिदिन गिरता भू-जल तथा भू-जल का अत्यधिक दोहन हमारे लिए चुनौती बन गए हैं और आने वाली पीढिय़ों के लिए इन्हीं चुनौतियों का समाधान निकालने की हमने शुरूआत की है। दुनिया भर में ऐसा माना जा रहा है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध होगा तो वह पानी के लिए होगा। इसलिए हमें भावी पीढ़ी के लिए अभी से ही पानी का संरक्षण करना होगा। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि अगर हम अपने जीवन में भावी पीढ़ी के लिए कुछ छोडकर जाएं तो पानी से बेहतर कोई विकल्प नहीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे पूर्व भी वे इसके बारे किसान संघों के नेताओं से भी अपील कर चुके हैं वे किसानों को धान की बजाय अन्य वैकल्पिक फसलें की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने यह भी बताया कि इस दिशा में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग भी जल संरक्षण की नई योजनाएं तैयार कर रहा है और इसमें किसान नेताओं व प्रगतिशील किसानों से सुझाव आमंत्रित किये गए हैं। मुख्यमंत्री ने किसानों से भी आह्वान किया है कि वे भी अपने सुझाव विभाग को भिजवाएं। सीएम ने कहा कि हमें आमजन तक यह संदेश देना होगा कि पानी बचाना है तो धान नहीं लगाना है बल्कि धान के स्थान पर इसके बराबर आमदनी वाली फसलें उगानी हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि चरखी दादरी जिले की ग्राम पंचायत पैंतावास कलां ने अपने गांव में धान की फसल न बोने का संकल्प लेकर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जोकि किसी भी पंचायत के लिए एक बड़ी सोच है और यह प्रदेश की अन्य पंचायतों के लिए भी एक प्रेरणा का काम करेगी।
एक किग्रा. चावल उगाने पर खर्च होता है 3 से 5 हजार लीटर पानी
मुख्यमंत्री ने किसानों से यह भी अपील की है कि जो किसान पंचायती जमीन ठेके पर लेकर खेती करते हैं वे धान के स्थान पर मक्का, अरहर व अन्य फसलों की ही बुआई करें और सरकार द्वारा चलाए जा रहे ह्यजल ही जीवन हैह्ण अभियान को सफल बनाने में अपना योगदान दें। उन्होंने कहा कि हमें यह बात समझनी चाहिए कि एक किलोग्राम चावल उगाने पर 3000 से 5000 लीटर पानी की खपत होती है। उन्होंने कहा कि इस बार कोरोना महामारी के चलते धान की रोपाई के लिए प्रवासी मजदूरों की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या बन गई है। मुख्यमंत्री ने किसानों से यह भी अपील की है कि वे गेहूं की फसल की कटाई के बाद धान की बजाय ढैंचा लगाएं, जो पशु चारे के साथ-साथ हरी खाद का काम भी करता है। आमतौर पर किसान कुछ समय बाद ढैंचे की फसल की खेत में जुताई कर देता है और इससे भूमि की उर्वरक शक्ति भी बढ़ती है। उन्होंने कहा कि विभाग द्वारा हरियाणा बीज विकास निगम के माध्यम से प्रदेश में ढैंचा का लगभग 29 हजार क्विंटल बीज उपलब्ध करवाया गया है। इसलिए जो किसान ढैंचा लगाने के इच्छुक हैं तो वे मंडियों से जब गेहूं की फसल बेचकर जाएं तो हरियाणा बीज विकास निगम के केन्द्रों से बीज लेकर जाएं।


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