सिरसा में दो बार तो कुरुक्षेत्र में एक बार पधारे थे श्री गुरु नानक देव जी, जानें पूज्य गुरू जी की जीवोद्धार पावन रूहानी यात्राओं के बारे में
24 साल में दो उपमहाद्वीपों के 60 प्रमुख शहरों में की 28 हजार किमी यात्राएं
मीडिया जंक्शन। संदीप कम्बोज
हिसार। संतों का हर कर्म सृष्टि के भले के लिए होता है। श्री गुरु नानक देव जी ने समाज और मानवता को एक सूत्र में पिरोने के लिए विश्व भर में सांप्रदायिक एकता, शांति, सदभाव के ज्ञान को बढ़ावा दिया व सिख समुदाय की नींव रखी। आप जी ने दुनिया के कोने-कोने में 4 जीवोद्धार रूहानी यात्राएं(उदासियां) की। श्री गुरु नानक देव जी की पावन जीवोद्धार यात्राओं का मकसद समाज में मौजूद ऊंच-नीच, जात-पांत, अंधविश्वास आदि को खत्म कर आपसी सद्भाव, समानता कायम करना था। वे जहां भी गए, एक परमात्मा की बात की और सभी को उसी की संतान बताया। उनकी यह पावन यात्राएं आज भी कई मसलों को हल करने का रास्ता बन सकती हैं। खास बात यह है कि श्री गुरु नानक देव जी इन यात्राओं के दौरान रास्ते में पड़ने वाली हर रियासत के राजा या बादशाह से मिले और उन्हें ये बातें समझाईं। इन पावन रूहानी यात्राओं के दौरान श्री गुरु नानक देव जी ने दो बार हरियाणा की पान धरा पर भी अपने पावन चरण टिकाए थे। पहली यात्रा के दौरान पूज्य गुरु जी ने हरियाणा के सिरसा व कुरुक्षेत्र में पधारे थे तो वहीं पूज्य गुरु जी की तीसरी पावन रूहानी यात्रा में भी सिरसा शहर में आगमन का जिक्र है। श्री गुरु नानक देव जी ने 24 साल में दो उपमहाद्वीपों के 60 प्रमुख शहरों में 28 हजार किमी का सफर पैदल तय कर यात्राएं की।
पहली यात्रा : अपनी पहली यात्रा के दौरान श्री गुरु नानक देव जी पंजाब से हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल, सिक्किम, भूटान, ढाका, असम, नागालैंड, त्रिपुरा, चटगांव से होते हुए बर्मा (म्यांमार) पहुंचे थे। वहां से वे ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और हरियाणा होते हुए वापस आए थे। पहली यात्रा के दौरान भ्ी गुरु नानक देव जी हरियाणा के सिरसा व कुरुक्षेत्र शहरों में ठहरे थे।
दूसरी यात्रा : दूसरी यात्रा में श्री गुरु नानक देव जी पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान), सिंध, समुद्री तट के इलाके घूमते हुए गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु के तटीय इलाकों से होते हुए श्री लंका पहुंचे और फिर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा होते हुए वापस आए।
तीसरी यात्रा : अपनी तीसरी यात्रा के दौरान श्री गुरु नानक देव जी हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तिब्बत (सुमेर पर्वत का इलाका) होते हुए लेह-लद्दाख, कश्मीर, अफगानिस्तान (काबुल), पश्चिमी पंजाब होते हुए वापस आए थे। इस यात्रा के दौरान भी हरियाणा के सिरसा की पावन धरा को श्री गुरु नानक देव जी के पावन चरणों की छोह प्राप्त हुई थी।
चौथी यात्रा : गुरु नानक देव जी अपनी चौथी यात्रा में मुल्तान, सिंध, बलोचिस्तान, जैदा, मक्का पहुंचे और मदीना, बगदाद, खुरमाबाद, ईरान (यहां उनके साथी भाई मरदाना का निधन हो गया था), इसफाहान, काबुल, पश्चिमी पंजाब से होते हुए करतारपुर साहिब वापस लौटे थे।
पांचवीं यात्रा : इस यात्रा की पुष्टि नहीं है, लेकिन डॉ. कुलदीप सिंह ढिल्लों के शोध के मुताबिक, 5वीं यात्रा में गुरु जी ने 2334 किलोमीटर का सफर किया था।
जानें क्या है श्री गुरु नानक देव जी की इन यात्राओं का महत्व
1. गुरु जी पहली यात्रा पर निकले थे। वे भाई मरदाना के साथ सैदपुर नगर पहुंचे और वहां मेहनतकश बढ़ई भाई लालो के यहां ठहरे। शूद्र अर्थात नीची जाति के भाई लालो ने सेवा भाव से जो रूखा-सूखा दिया गुरु साहिब ने उसे स्वीकार किया। हालांकि, उस दौर में नीची जाति के यहां ऊंची जाति वालों का खाना-पीना अच्छा नहीं समझा जाता था। खैर, भाई मरदाना ने गुरु जी से सवाल किया कि इस रूखे-सूखे भोजन में भी स्वादिष्ट खाने जैसा आनंद कैसे है? गुरु जी ने कहा कि इस इंसान के दिल में प्रेम है, यह कड़ी मेहनत करके कमाई करता है। इसमें परमात्मा की बरकत पड़ी हुई है।
2. उसी समय सैदपुर नगर के जागीरदार मलिक भागो ने ब्रह्म भोज रखा था। उसने दूसरे साधु-संतों के साथ गुरु जी को भी निमंत्रण भेजा। भोज के लिए जो सामग्री इकट्ठा की गई थी, वह किसानों के घरों से जबरन लाई गई थी। सब पहुंचे, लेकिन गुरु जी नहीं आए। भागो ने गुरु जी से भोज में न आने का कारण पूछा। गुरु जी ने उत्तर देने की बजाय भाई लालो के घर का रूखा-सूखा और घर का पूड़ी-हलवा मंगवाया। एक मुट्ठी से लालो जी के रूखे-सूखे खाने को निचोड़ा तो उससे दूध की धारा बह निकली। दूसरी मुट्ठी से जब मलिक भागो के व्यंजन को निचोड़ा तो उसमें से खून की धारा निकली। गुरु जी ने वहीं कहा, "यह है धर्म की कमाई की दूध की धारा और यह है पाप की कमाई की खून की धारा।" यह देख मलिक भागो गुरु जी के चरणों में गिर पड़ा और अपने किए पापों व लूटपाट का प्रायश्चित कर धर्म की कमाई करने लगा।
3. एक गांव से गुजरते हुए कुएं के लालची मालिक ने गुरु जी को पैसे दिए बिना पानी देने से मना कर दिया। गुरु जी हाथ से मिट्टी खोदने लगे। कुछ ही देर में साफ पानी आने लगा। गांव वाले भी पानी पीने वहां पहुंच गए। कुएं के मालिक ने देखा एक तरफ धारा बह रही थी, दूसरी तरफ उसके कुएं का पानी कम हो रहा था। गुस्से में आकर उसने गुरु जी की ओर पत्थर मारा। गुरु जी ने हाथ आगे किया और पत्थर वहीं रुक गया। ये देख कुएं का मालिक उनके चरणों पर गिर पड़ा। गुरु जी ने समझाया, ह्यकिस बात का घमंड? खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाओगे। अच्छा करोगे तो लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहोगे।
जानें श्री गुरु नानक देव जी ने कैसे रखी सिख धर्म की नींव
श्री गुरु नानक देव जी ने 15अप्रैल,1469 के पावन दिन गाँव तलवंडी, जिला शेखुपुरा (जो आज के दिन ननकाना साहिब, पंजाब ,पाकिस्तान में है) में बाबा कालूचंद्र बेदी के घर माता त्रिपता की पवित्र कोख से अवतार धारण किया। श्री ननकाना साहिब वर्तमान में लाहौर पाकिस्तान से 65 किमी की दूरी पर पश्चिम में स्थित है। उनके पिता पूज्य माता-पिता ने उनका नाम नानक रखा। पिता कालूचंद्र गाँव में स्थानीय राजस्व प्रशासन के अधिकारी थे। अपने बाल्य काल में श्री गुरु नानक जी नें कई प्रादेशिक भाषाएँ सिखी जैसे फारसी और अरबी। वर्ष 1487 में पूज्य माता-पिता ने आप जी का विवाहकर दिया औरआप जी के दो पुत्र एक वर्ष 1491 तो दूसरा वर्ष 1496 में हुआ। वर्ष 1485 में आप जी ने अपने भैया और भाभी के कहने पर दौलत खान लोधी के स्टोर में अधिकारी के रूप में निकुक्ति ली जो की सुल्तानपुर में मुसलमानों का शासक था। वही पर उनकी मुलाकात एक मुस्लिम कवी के साथ हुई जिसका नाम था मिरासी। वर्ष 1496 में श्री गुरु नानक देव जी ने पहली भविष्यवाणी की जिसमें आप जी ने कहा कि कोई भी हिन्दू नहीं और ना ही कोई मुस्लमान है और कहा कि यह एक महत्वपूर्ण घोषणा है जो ना सिर्फ आदमी के भाईचारे और परमेश्वर के पितृत्व की घोषणा है, बल्कि यह भी स्पष्ट है की मनुष्य की प्राथमिक रूचि किसी भी प्रकार के अध्यात्मिक सिधांत में नहीं है, वह तो मनुष्य और उसके किस्मत में हैं। इसका मतलब है अपने पड़ोसी से अपने जितना प्यार करो। श्री गुरु नानक देव जी ने अपनी यात्राओं की शुरूवात मरदाना के साथ की। आप जी ने जाती भेद, मूर्ति पूजा और छद्म धार्मिक विश्वासों के खिलाफ प्रचार किया। अपने सिद्धांतो और नियमों के प्रचार के लिए पूज्य गुर जी ने अपने घर तक को त्याग दिया और एक सन्यासी के रूप में रहने लगे। हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों के विचारों को सम्मिलित करके श्री गुरु नानक देव जी ने एक नए धर्म की स्थापना की जिसे आज सिख धर्म के नाम से जाना जाता है। अपने ज्ञान के प्रसार के लिए आप जी ने कई हिन्दू और मुश्लिम धर्म की जगहों का भ्रमण किया।
श्री गुरु नानक देव जी अपनी पहली पावन रूहानी यात्रा के दौरान जब हरिद्वार पधारे तो यहां देखा कि कुछ लोग गंगा तट पर खड़े थे। आप जी ने देखा कि कुछ व्यक्ति पानी के अन्दर खड़े हो कर सूर्य की ओर पूर्व दिशा में देखकर पानी डाल रहें हैं उनके स्वर्ग में पूर्वजों के शांति के लिए। पूज्य गुरु जी भी अपने दोनों हाथों से अपने राज्य पूर्व में पंजाब की ओर खड़े हो कर पानी डालने लगे। जब यह देख लोगों ने बताया कि आप पानी गलत डाल रहे हैं तो आप जी ने बड़े ही प्यार से उत्तर दिया कि अगर गंगा माता का पानी स्वर्ग में आपके पूर्वजों तक पहुँच सकता है तो पंजाब में मेरे खेतों तक क्यों नहीं पहुँच सकता क्योंकि पंजाब तो स्वर्ग से पास है। इसी तरह समस्त भारतवर्ष में ज्ञान बांटने के पश्चात आप जी ने मक्का मदीना की भी यात्रा की और वहां भी लोग आप जी के विचारों और बातों से अत्यंत प्रभावित हुए। आखिर में अपनी 25 वर्ष की यात्रा के बाद श्री गुरु नानक देव जी करतारपुर, पंजाब के एक गाँव में किसान के रूप में रहने लगे और बाद में यहीं 22 सितंबर 1539 को ज्योति ज्योत समा गए।
ये हैं श्री गुरु नानक देव जी से जुड़े कुछ प्रमुख गुरुद्वारा साहिब
गुरुद्वारा कंध साहिब: बटाला (गुरुदासपुर) गुरु नानक का यहाँ पत्नी सुलक्षणा से 18 वर्ष की आयु में संवत्? 1544 की 24वीं जेठ को विवाह हुआ था। यहाँ गुरु नानक की विवाह वर्षगाँठ पर प्रतिवर्ष उत्सव का आयोजन होता है।
गुरुद्वारा हाट साहिब: सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) गुरुनानक ने बहनोई जैराम के माध्यम से सुल्तानपुर के नवाब के यहाँ शाही भंडार के देखरेख की नौकरी प्रारंभ की। वे यहाँ पर मोदी बना दिए गए। नवाब युवा नानक से काफी प्रभावित थे। यहीं से नानक को ह्यतेराह्ण शब्द के माध्यम से अपनी मंजिल का आभास हुआ था।
गुरुद्वारा गुरु का बाग: सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) यह गुरु नानक देव जी का घर था, जहाँ उनके दो बेटों बाबा श्रीचंद और बाबा लक्ष्मीदास का जन्म हुआ था।
गुरुद्वारा कोठी साहिब: सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) नवाब दौलतखान लोधी ने हिसाब-किताब में गड़बड़ी की आशंका में नानकदेवजी को जेल भिजवा दिया। लेकिन जब नवाब को अपनी गलती का पता चला तो उन्होंने नानकदेवजी को छोड़ कर माफी ही नहीं माँगी, बल्कि प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन गुरु नानक ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
गुरुद्वारा बेर साहिब : सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) जब एक बार गुरु नानक अपने सखा मदार्ना के साथ वैन नदी के किनारे बैठे थे तो अचानक उन्होंने नदी में डुबकी लगा दी और तीन दिनों तक लापता हो गए, जहाँ पर कि उन्होंने ईश्वर से साक्षात्कार किया। सभी लोग उन्हें डूबा हुआ समझ रहे थे, लेकिन वे वापस लौटे तो उन्होंने कहा- एक ओंकार सतिनाम। गुरु नानक ने वहाँ एक बेर का बीज बोया, जो आज बहुत बड़ा वृक्ष बन चुका है।
गुरुद्वारा अचल साहिब: गुरुदासपुर अपनी यात्राओं के दौरान नानक देव जी यहाँ रुके और नाथपंथी योगियों के प्रमुख योगी भांगर नाथ के साथ उनका धार्मिक वाद-विवाद यहाँ पर हुआ। योगी सभी प्रकार से परास्त होने पर जादुई प्रदर्शन करने लगे। नानकदेवजी ने उन्हें ईश्वर तक प्रेम के माध्यम से ही पहुँचा जा सकता है, ऐसा बताया।
गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक : गुरुदासपुर जीवनभर धार्मिक यात्राओं के माध्यम से बहुत से लोगों को सिख धर्म का अनुयायी बनाने के बाद नानकदेवजी रावी नदी के तट पर स्थित अपने फार्म पर अपना डेरा जमाया और 70 वर्ष की साधना के पश्चात वर्ष 1539 ई. में परम ज्योति में समा गए।


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