व्यंग्य आलेख : नेताजी का फिजूलखर्ची अभियान


व्यंग्य आलेख : नेताजी का फिजूलखर्ची अभियान 
नेताजी इन दिनों काफी बदल गए हैं। परसों तक तो ठीक थे। बस कल ही से सारा परिवर्तन प्रकट हुआ है। वे मानते हैं कि सरकार से फिजूल खर्च हुआ है लेकिन ये जानबूझकर नहीं हुआ। बताया ही नहीं किसी ने कि सरकार फिजूल में ही खर्च कर रही है। उल-जूलूल बकने तक तो ठीक था। काम चल जाता था। कभी-कभी छोटा-मोटा संकट आता था और चुपके से चला जाता था लेकिन फिजूल खर्च तो सचमुच ही .....तौबा तौबा ! मीटिंग ही करनी है तो फाइव स्टार में ही क्यूं ? आॅफिस के एसी का मान करना भी तो कोई फर्ज होता है। फाइव स्टार होटल की मीटिंग में, मजबूरीवश जो डकारना होता है वो विदेशी मेहमानों की आवभगत के समय पर कर लेंगे। सचमुच उनका ह्रदय परिवर्तन हो गया है । पत्रकारों ने पूछा,‘‘अब आप कैसा फील कर रहें हैं ?’’ नेताजी खिल उठे - बोले,‘‘वैसा ही जैसा मुझे करना चाहिए। देखिए, हमारा चुनाव होनहार जनता करती है। इसलिए सयानी पब्लिक की बात मानना हमारा धर्म भी है और कर्म भी। हमें तो फाइव स्टार का पता ही नहीं था।’’ सैके्रट्री बोले, ‘‘फाइव स्टार में मीटिंग है तो है। भाई! ये महकमा जाने और महकमे के आला अफसर। हम रोकते थे उनको कि आॅफिस के मीटिंग हाल में क्या कमी है बताओ? तो अफसर लोग झिड़क देते थे । सर ! स्टेटस...स्टेटस के अनुसार चलिए। मंत्री बनें तो मंत्री वाला लहजा होना भी तो जरूरी है। पत्रकार भाई लोग छापेंगे नहीं, प्रेस कांफ्रेंस वाली खबरें कि मंत्री जी को अच्छे मैनर्स नहीं आते हैं। साथ-साथ खाते रहें, साथ-साथ बतियातें रहें। हो गई मीटिंग। कल तो पत्नी और बच्चे कहें कि फाइव स्टार चलिए तो ये बहरे लोग कैसे पहचानेंगें कि आप ही मंत्री, जो अक्सर यहां मीटिंग-सीटिंग करने के लिए आते रहते हैं! अब किसकी मानें और किसकी न मानें ? वैसे हम तो बेसिकली इंडियन कल्चर वाले हैं। घर में ही घर की बनाई रोटी खाकर ही खुश हैं। जो घर में मजा है, वह मजा वहां कैसे आ सकता है ? पत्नी को शोभा घर से होती है? होटल से नहीं। अक नहीं !’’
करते-करते नेता जी ने बहुत सारी बातें कर डाली। दिल की बातें जो दिल में दबी कुचली थीं, कह डालीं । जरूरी भी था । फिजूल खर्च का पाप लेकर थोड़े ही जनता के बीच में जाएंगें ! फिजूल खर्ची रोकेंगे, देश को बचाएंगे। बोले, ‘‘पिछली बार हवाई जहाज से जो बयालिस दौरे किए थे अब घटाकर चैबीस कर दिए हैं यानी अठारह दौरों की फिजूलखर्ची बंद। राष्ट्र का पैसा बचाओ और राष्ट्र को महान बनाओ। अब सब कुछ हमारे ही हाथ में तो होता नहीं। विदेश वाले इन्वाइट करें तो कैसे ना बोल दें उन्हें। देश का तो आना-जाना ही खर्च हुआ। उधर के फाइव स्टार होटल का खर्च तो वहीं विदेश वाले ही करेंगे इसलिए जाने को भी मन करता है। वहां इधर-उधर घूमेंगे तो सारा प्रबन्ध उनका। झरने, तालाब, नदी, घाटी, बाग-बगीचे सब जगह वही लोग ले जाते हैं। अब हमारे देश का नाम वो बड़ी इज्जत है। हम बड़ी ताकत जो बन गए हैं। अब हमारे देश का नाम वो बड़ी शान से पुकारते हैं। जब से अट्ठाइस रुपए से ऊपर की आमदनी वाले गरीब लोग अमीरों की श्रेणी में काउंट हुए हैं, देश का नक्शा ही बदल गया है। भला हो योजना आयोग का जो रातों में ही उन्होंने गरीबी खत्म कर दी। आंकड़ों के हिसाब से अब हमारे देश में गरीब लोग समझिए बचे ही नहीं। जो पांच-दस परसैंट बचे हैं उनकी तरकीब भी जल्दी ही खोज ली जाएगी।
 हमारा भारत जल्दी ही ताजा अमीरों का देश होने वाला है। यह फिजूलखर्ची दस बीस दिन तक जारी रही तो जो अरबों रूपया बचेगा उससे हम देश की रक्षा के लिए बिना कमीशन दिए हवाई जहाज खरीदेंगे। देश का पैसा देश में ही हजम।’’ कहते-कहते नेताजी मारे खुशी के चिल्ला उठे,‘‘अब हमारी पार्टी की टीआरपी भी बढ़ गई है। हे भगवान ! इस तरकीब का फाइव स्टार होटल में जाकर ही एन्जाय करके शुक्रिया अदा करूंगा, शैम्पैन के साथ ! तभी जनता जिन्दाबाद जिन्दाबाद पुकारेगी।’’ वे मन ही मन फिजूलखर्ची अभियान पर काख बजाते हुए गाड़ी तेजी से दौड़ाते हुए फाइव स्टार होटल के स्वीमिंग पूल पर जा खड़े हुए। फिजूलखर्ची की पौ बारह ही कर डाली उन्होंने जैसे ! अक नहीं !
-डॉ. राजकुमार निजात
वरिष्ठ साहित्यकार, सरसा

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